उसकी एक तरंग से सारी सृष्टि चलती है और तुम भी उसकी स्पंदन हो फिर क्यूँ पड़ते हो शब्दों की जंजाल मैं उसने ऐसा कहा क्यूँ कहा, कैसे कहा मुझे ऐसा लगता है ऐसा होना चाहिए था उसे ऐसा करना चाहिए शब्दों के तार जब धुन पकड़ते हैं तो तर्क चलते रहते हैं एक शब्द दो होते हैं दो से चार होते हैं डोर से रस्सा बन जातें हैं तुम्हें घिस जाते हैं तुम छीलनी होते जाते हो फिर भी रुक नहीं पाते हल्के से शब्द पत्थर बन जाते हैं बाक़ी जीवन तुम उन्हें ठोते रहते हो पीड़ित हो पुकारते रहते हो पता नहीं कहाँ शूरुआत हुई नासमझी मैं मार जाते हो अगर पकड़ना ही है तो गुरु वाक्य पकड़ो गुरु शब्दों मैं गहरायी हैं गुरु शब्दों मैं थहराओ है गुरु संग मैं रुक कर भी अनंत पहुँचते हो थम कर भी विस्तारित होते हो विशाल और शून्य जैसे होते हो एक पल मैं उस तरं...
"Sofar" captures the distance traveled so far from now.