Wednesday, September 07, 2011

Art of living satsang update

Make your anger very expensive, very precious. Nobody should be allow to buy it at any cost.
Make your smile cheap. Just let it flow without being asked for. It is the only expression which is closest to your core nature.

अपना गुस्सा बहुत मेहेंगा कर दो. दुनिया मैं कोई उसे नहीं खरीद पाए. वहीँ अपनी मुस्कान इतनी सस्ती कर दो की वोह यूँही प्रकट होती रहे. 

ज़िन्दगी मैं तृप्त रहो. यही सबसे बड़ा गुण है. 

हम भिखारी की तरेह सबसे कुछ न कुछ मांगते रहते हैं. जब कोई भिखारी हमारे सामने आता है तो हम क्या करते हैं. हम चुप चाप रास्ता बदल रहते हैं या फिर गाड़ी की खिड़की ऊपर कर लेते हैं, उसकी तरफ देखतें भी नहीं हैं. प्रकृति का भी व्योहार कुछ इस तरेह से ही होता है. 

कहते हैं जो ध्यानस्त होते हैं, वेद और ज्ञान उनकी तरफ ही अग्रसर होते हैं. जैसे पंडित मंदिर मैं दिन भर वेदों का उच्चारण करते हैं लेकिन फिर भी दुखी  दिखतें हैं, उनके चेहरे पर न तेज होता है न कोई चमक.   ज्ञान मांगने से या फिर दोहराने से नहीं मिलता है. 

Knowledge comes to those who are in meditation. The chanting of old mantras in rudra pooja then becomes familiar. You may not understand the meaning of sanskrit slokas but you get a feeling that you have heard them some where before. They have been part of you.

Nature gives to those who do not demand and are in continuous state of contentment. Nobody likes a beggar, not even nature. It runs away with its resources when you beg in front of it. It releases abundance to one who has stopped asking and is in grateful state.

 अगर कुछ माँगना ही है तो परमात्मा को मांगो, उसको मांगते मांगते कोई कामना नहीं रहती. उसकी कृपा होने से ही वोह    मिलता है और एक बार मुलाकात मैं तुम .ठहर जाते हो. फिर कहीं जाना नहीं होता है.

क्या परमात्मा दुसरे नंबर पर तो नहीं है. जैसे की दूध गैस पर रखा हो और तुम  ध्यान मैं   बैठे हो. ध्यान तो परमात्मा पाने के लिए है लेकिन मन मैं अगर यह डर है की  कहीं दूध न उबल जाये तो दूध नंबर एक और  परमात्मा नंबर दो पर चले गए न. इसी प्रकार ज़िन्दगी मैं  हमारी छोटी छोटी .  मांगे नंबर एक पर आती रहती हैं और वो पूरी होती रहती हैं. हम बीमार होते हैं तो स्वस्थ मांगते हैं और किसी तरेह ठीक हो ही जातें हैं, लेकिन फिर हम बीमार पड़ते हैं और यह प्रक्रिया चलती रहती है. लेकिन जब  हमारी परमात्मा की  मांग पूरी होती है तो फिर वो पूरी ही रहती है.

एक बार एक बालक अपनी परछाईं मैं अपने सर को पकड़ रहा था, लेकिन उसका सर उसके पकड़ से दूर भागता रहता था. वह रोने लगा. एक संत वहां से गुजर रहे थे, नज़ारा देख कर समझ गए और कहा की "बालक, अपने सर पर हाथ रखो." बालक खुश हो गया क्यूंकि अब परछाईं का सर भी उसकी पकड़ मैं आ गया.

Respect and honor the thief too because of him the police,judge,jailor and teachers have employment. Honor the people who fall in the ditches around you to show you that there is a ditch, beware.

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Satsang happens in Art of Living ashram on kanakapura road in Bangalore everyday from 6:30PM. You can have dinner at ashram and then come back to your city house.
Satsang means the company of divine. There are many people but if you are a devotee then only you and the divine happen at satsang.
Special thanx to Bala for the free ride to ashram.
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