Monday, May 31, 2010

A rocking concert at Sri Sri Ashram

Ignorance is bliss, they say and we experienced it. We left home at about 6:25 PM and reached Sri Sri Ravishankar ji's ashram at about 7 PM. It was rainy and the drive was little slushy. We went and had dinner at Annapoorneswari hall and enjoyed the special delicacies served on sunday evening.

We were back in yagnashala at about 7:40 PM and sat down in peace listening to the bhajans. And then out of the blue the mesmerising voice of Rishi NityaPrayagji pierced the environment and were transformed into a rock concert.

Not a single soul could sit on their feet and everybody was in air , jumping and coordinating all forms of steps in all forms of dance. You had sparkling faces of few young swamis in their white dhoties dancing to the rhythm. Some folks were forming train and running around the whole place.

After the song he was urged with "once more" and "one more". Everybody wanted more.
He obliged and gave "ori sakhi mangal gayo ri" and we were mesmerised as few tears dropped and trickled down few cheeks.

Then he went back to his place and everybody settled down in their place. Then we went on for normal bhajans and voices. There was little unease as Guruji was not yet in. On most days the ashtavakra session starts at about 8 but now it was well beyond 8:15.

Again Rishi Nityaprayag jee had the mike in hand and we were roaring in mid air. Guruji did appear towards the end and felt the food of the crowd and himself led a bhajan. He only repeated a single line and it felt like whole universe was singing and following him.

He quoted the yoga sutras and mentioned the singnificance of the place and its purity and how it transformed individuals there.
And then came the news that we were shocked to hear. He mentioned a terrorist attack. A man fired a bullet while he was going out of satsang in his convoy. He said the man could not do more damage as his mind would have melted in the mood of satsangies and left and ran off after a single fire.

Then he welcomed all terrorists to come to ashram and enjoy the happiness and fearlessness of us. He also mentioned that few naxalites were meeting him on 1st and 2nd and would become part of us satsangies.
He threw open a challenge to all non-violent minds to come and experience the happiness that we had created and then decide their path.

An evening when terror was in air and we were totally unaware of its presence and swayed in satsang.
An evening when rains was in air and we chose to get drenched and drive back home in peace, even after knowing that our dear Guruji had a shot at his life but only a devotee of his got a minor injury.
It can only happen in Art of living ashram.

Sunday, May 30, 2010

प्रवृत्ति - निवृत्ति - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 9

प्रवृत्ति मैं आप कर्म करते हो, दोष को देखते हो ओर उसे सुधारते हो. आप दोषों को ढूँढ़ते नहीं हो, लेकिन वह जब आपके आस पास नज़र आते हैं तो आप उसको ठीक करने का प्रयाश करते हो. 
निवृत्ति मैं आप अंतर्मुखी होते हो. आप बहाए मुखी नहीं होते है ओर अपने आप मैं विश्राम करते हो. आपकी निगाह सिर्फ अन्दर की तरफ होती हैं. 

लेकिन हम प्रवृत्ति मैं अंतर मुखी हो जाते हैं ओर निष्क्रिये हो जाते हैं, निराशाबाद मैं चले जाते हैं ओर सोचतें हैं की "यह करके कोई फायदा नहीं होगा, क्यूं मैं आपना वक़्त बर्बाद करून". 

ओर निवृत्ति मैं मन को चंचल कर देते हैं, उसको भागते हैं, थकते हैं, परेशान करते हैं. मन कहीं ओर होता है ओर शरीर वहीँ का वहीँ स्थूल. मन की बैचैनी शरीर मैं उतर जाती है. ओर शांत होने की वजह हम ओर दुखी हो जाते हैं. 

यह शरीर स्थूल रूप मैं मिला है. जो तुम्हे मिला है उसे तो तुम जानते हो. यह सबके पास होता है ओर अलग अलग होता है. यह जीवन तुम्हे दिया जाता है की तुम इस स्थूल से सूक्ष्म की ओर बड़ो, अग्रसर हो. वही सूक्ष्म मैं अद्वैत है, सब एक है ओर चैतन्य शक्ति का मिलन है.


जनक कहते हैं, अहो!! अलख निरंजन, मैं शुद्ध हूँ, untouched, pure, eternal . एक उत्साह उनके अन्दर उमड़ता है. एक चमक आती है जिसे वह अपने अन्दर नहीं समां सकते ओर उछाल लगते है ओर कहते हैं "अहो!!", वाह वाह !! क्या बात है. यह बात कितनी सरल ओर सहज है. 

हमारे जीवन मैं भी कई मौके आते हैं ऐसे ज्ञान के लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पते है. हम सुप्त होते हैं ओर मौके चले जाते है. इसलिए जाग्रति अवश्यक है. 

इसलिए निवृत्ति मैं जाकर शक्ति का संग्रह करना अवश्यक है,  क्यूंकि जब हम प्रवृत्ति मैं अपने काम मैं इतना खो जाते हैं की हमें आसपास की सुध बुद्ध नहीं होती है. हम इस संसार के हो जाते है, यह शरीर भी संसार का है, इसके कस्ट भी संसार के हैं. उसी संसार मैं हम विलीन हो जाते है ओर "अहो!!" मौके छूट जाते हैं. 


आश्रम मैं भी चेले आकर गुरु से कहतें हैं कि "यह व्यक्ति आश्रम के लिए ठीक नहीं है, इसे निकाल दो.". व्यक्ति ठीक नहीं "गलत है", उसकी आदत ठीक नहीं "सही है". उसकी आदत बदलने का प्रयास करो. उसकी आदतें आश्रम मैं ठीक नहीं होगीं तो ओर कहाँ हो सकती हैं.
सिख समुदाय कि स्थापना के पीछे क्या कारण था. उस समय समाज मैं अत्याचार हद से ज्यादा बाद गया था तब हजारों लोगों के दिल से एक साथ पुकार हुई कि "वाह गुरु कि फ़तेह, वाहे गुरु का खालसा ". ओर संत सिपाही समाज मैं आये तलवार लेकर. गुरु ने भी तलवार हाथ मैं ली ओर सबके मुख मैं सिर्फ गुरुनाम, गुरवानी थी. सब अंतर्मुखी हुए पर जब प्रवृत्ति का वक़्त आया तो सभी कार्यशील हुए. समाज का आलस टूटा.
 

Friday, May 28, 2010

अलख निरंजन - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 7 & 8

तुम बस मैं चड़ते हो फिर उतरते हो. तुम किसी एक जगह से चड़ते हो ओर किसी ओर जगह पर उतरते हो. अगर तुम जहाँ चडे ओर वहीँ उतर गए तो फिर बस मैं चड़ने का क्या फायदा. तुम कोई circus के घोड़े पर तो नहीं बैठे हो, बस एक ही जगह हो, न आगे जाते हो बस एक जगह खड़े खड़े हिलते डुलते हो.
उसी प्रकार सारा ज्ञान पाने के लिए तुम हजारों बसोँ मैं चड़ो पर फिर उनसे उतरना भी सीखो. तुम ज्ञान के बंधन मैं भी नहीं बंध सकते हो. समाधी लगाना सीखो, समाधी मैं रहो, लेकिन उसे बंधन न बनायो. 


तुमने कुछ पाया है, तुमने कुछ खोया है ओर अब तुम्हें  अब बहुत कुछ देना भी है. 


तुम निःसंग हो, निष्क्रिये हो,  प्रकाशमान हो, निरंजन हो, शुद्ध हो. 
तुम निरपेक्ष, निर्विकार हो, निर्भर ओर शीतल हो. 
तुम्हे सिर्फ यह चिन्न मात्र चैतन्य का बोध हो, बस. 


आप एक जीवन मैं कितना खाना खाते हो, कितने ट्रक भरकर खाना तुम्हारे मुख से होकर तुम्हारे अन्दर जाता है, आधे से ज्यादा तो निकल जाता है, बाकि शरीर बनाने मैं लग जाता है. जरा हिसाब लगा के देखो की अगर आप एक दिन मैं २ किलो खाना खाते हो तो एक ४० वर्ष की आयु मैं कितने टन खा चुके होगे. 


जीवन मैं पांच रहस्य  होते हैं,   उनमें से एक होता है की तुम किसके यहाँ जन्म लेते हो. लेकिन तुम्हे कर्म करने की स्वाधीनता भी होती है जिससे तुम अपना भविष्य बदल सकते हो. अगर तुम्हारी इच्क्षा प्रबल ओर शुद्ध हो तो कोई तुम्हारे जीवन मैं आता है जो तुम सत्मार्ग पर ले जाता है. उसके साथ जाने के लिए लेकिन आपको पहले खुद पे भरोशा होना होगा ओर फिर अपने मार्ग दर्शक पर ओर उसके बताये रास्ते पर. 


आपके मन मैं व्याकुलता होती अपने कस्टोँ को लेकर. आप जानना चाहते हैं की पता नहीं मैंने क्या पाप किये थे की मेरे मैं यह अवगुण हैं या फिर मैं ऐसी परिश्तिति मैं बार बार पड़ता हूँ.  आप व्यक्ति, परिश्तिति, ओर अपने आप को बदलना  चाहतें हैं, आप इस दुःख से भागना चाहते है ओर सोचतें हैं की अगर मैं यहाँ से वहां चला गया तो मेरा निवारण हो जाएगा. 
मगर ऐसा नहीं होता है, पिक्षले जन्म की जितनी ज्यादा यादें होगीं तुम्हारी तकलीफें उतनी ज्यादा होंगी, इस जन्म की यादें ही तुम्हे बर्बाद कर चुकी हैं ओर तुम चाहते हो की ओर भी जन्मों की यादें हो, तब तुम्हारा तो कचूमर निकल जाएगा. अपने को अपनी यादों के बंधन से मुक्त करो. 
यह मन की क्रिया है ओर इसे मन तक ही सिमित रहने दो. शरीर की कमजोरियों को शरीर तक रहने दो. तुम असंग हो ओर तुममें  क्षमता है की तुम अपने मन की मति को शक्ति की ओर अग्रसर कर सकते हो,  ओर कमजोर क्रियाओं को ध्वंश कर सकते हो. अपने व्योहार पर ध्यान दो. जैसी मति वैसी गति होगी.

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के यहाँ संतान का जन्म होना था. उसकी पत्नी प्रसब पीड़ा से व्याकुल थी ओर डॉक्टर ने कहा की ऑपरेशन करना पड़ेगा, मुल्ला ने कहा एक मिनट रुको ओर वह बाजार से जाकर आया. उसने बहार खिलोअना  रख दिया ओर डॉक्टर से कहा की उससे कह दो बहार खिलोअने हैं तो वह बहार आ जाएगा. वह मुल्ला की संतान है ओर इस लालच को ठुकरा नहीं सकती है. 


यह देवी देवताओं के मंदिर इतने उचें उचें पहाडोँ पे क्यूं होतें हैं. इसलिए की जब आप ऊपर चड़ते हैं तो आपकी साँस एक लय मैं चलती  है, वही लय आपके के लिए सुध्र्शन क्रिया होती है ओर जब आप ऊपर पहुंचतें तो विश्राम की अवस्था मैं होतें हैं ओर सुखी अनुभव करते हैं, तब आप को लगता है की इश्वर ने मेरी सुन ली है. 



भव भय भंजन अलख निरंजन, नारायण, नारायण.

Wednesday, May 26, 2010

आत्म विस्वास हो - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 6

जो लोग मेरे पास आकर  कहते हैं की आत्म विस्वास कहाँ से लायें तो मैं उन्हें कहता हूँ की "भूल जाओ " तुम्हे आत्म विस्वास कभी नहीं मिल सकता. जिसे तुम बाहर ढूँढ़ते हो तुम उससे बने हो. 

तुम निर्बल नहीं हो. तुम जो भी करते हो, सोचते हो उससे संसार पर उतना ही असर पड़ता है जितना तुम्हारे आस पास के लोगों का तुम पर पड़ता. तुम जितना ज्यादा शुद्ध होगे तुम्हारा असर उतना ज्यादा होगा.

तुम स्नान करते हो तो तुम्हारा शरीर शुद्ध होता है. कुछ लोग जो हिप्पी होते हैं, उनके बाल उलझ जाते हैं ओर उसमें कीड़े मकोड़े अपना घोंसला बना लेते हैं.
तुम सत्संग मैं होते हो, गाते हो, सुनते हो तो तुम्हारा मन शुद्ध होता है.
तुम ज्ञान ग्रहण करते हो तो बुद्धि शुद्ध होती है.
तुम सेवा करते हो तो तुम्हारा कर्म शुद्ध होता है, तुम्हारे आस पास के लोग शुद्ध होते हैं. तुम्हारा आस पड़ोस शुद्ध होता है. 
तुम जितना ज्यादा शुद्ध होगे उतने ज्यादा निर्मल ओर सरल होगे.


तुम साक्षी हो, तुम आत्मा हो. आत्मा ही साक्षी है. इसका तुम्हे बोध हो, बस, फिर तुम सुखी हो. इस सर्प रुपी संसार के परे तुम आनंद से पूर्ण हो, तृप्त हो हो, परमानन्द हो. तुम्हे सिर्फ मुक्त होने का अभिमान रहे, फिर ओर किसी अभिमान की जरूरत नहीं है.


जब तुम दुःख मैं होते हो तो एक पत्थर के सामान होते हो, भारी, ऐसा लगता है की भोज ढो रहे हो, दबे जा रहे हो. 
जब तुम सुखी होते हो तो एक फूल के सामान होते हो, खुसबू फैलाते हुए फिरते हो. तुम्हे भी खुसबू तो मिलती ही है. ऐसा लगता है की खिलते जा रहे हो, फैलते जा रहे हो. 

तुम किस जिम्मेदारी के नीचे दबे हो, कल तुम्हारी मृत्यु  हो जाएगी  फिर तुम्हारी जिम्मेदारी का क्या होगा. जो जिम्मेदारी निभा रहा है उस को निभाने दो तुम क्यूं इस भोझ मैं दबे जा रहे हो. तुम तो भस्म हो, एक दिन राख हो जाओगे. उससे पहले अपनी दुनिया जितनी शुद्ध कर सको करलो. 

तुम्हारे अन्दर एक सत्ता है, एक शक्ति है, जो असंग है, अक्रिये है, जो साक्षी है, जो पूर्ण है, जो तृप्त है, जो मुक्त है, जो शांत है, जो सुख है, जो विस्वास है, जो आनंद है . उसमें विलीन हो जाओ, उसके बोध मैं रहो.

जैसी तुम्हारी मन की मति होगी वैसी तुम्हारी गति होगी. जैसी मति वैसी गति.


एक बार एक इंसान जो एक बाग़ का रक्षक था एक पत्थर   पर चड़कर लोगों को बुलाता था ओर कहता था की "आओ मेरे बाग़ के फूल ले जाओ, फल ले जाओ, मेरे बाग़ मैं घूमो फिरो". लेकिन जब वह पत्थर  से उतरता था तो लोगों को डंडा दिखाकर भगाता था. सब परेशान थे की ऐसा क्यों करता है, अगर वह इंसान आजकल होता तो उससे पागल करार देते ओर जेल मैं डाल देते लेकिन उस ज़माने के लोगों ने ऐसा नहीं किया. एक बुद्धिमान ने कहा के इस पत्थर के नीचे खोद के पता करो की क्या है. तो वहां राजा विक्रमादित्य का सिंहासन निकला. 

तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे विचार ओर उनका असर समाज पर रहता है इसलिए जब तक हो सोच समझ कर विचार छोड़ो.   


अब किस भ्रम मैं हो.

Tuesday, May 25, 2010

विशुद्ध आत्मा हो - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 5

तुम एक शुद्ध आत्मा हो, अगर देखो तो तुम वही हो जो सब मैं हो ओर न देखो तो तुम किसी मैं नहीं हो. तुम जब तक अपनी शुद्धता तक नहीं पहुंचतें तब तक भय से मुक्त भी नहीं हो सकते. 

अल्लाहाबाद के इंसान ने घर आकर अपने सरे परिवार जनों की हत्या कर दी. जब उसने प्राणायाम ओर ध्यान सिखा तब उसे लगा की पता नहीं तब क्या हो गया था. किस भूत ने उस पर हावी हो कर हत्या करा दी. वह अब साक्षी मान कर उस क्षण को देखता तो उसे भी अजीब लगता है. 

हम सब भी अगर अपने पुर्व मैं जायें तो ऐसी कितनी घटनायें मिलेंगी जब हमने कुछ कहा हो ओर बाद मैं लगा हो की "यह मैंने कैसे कह दिया, मैंने उसका दिल ऐसे कैसे दुख दिया"

दूसरों की छोड़ो, अगर तुम्हे शेयर बाज़ार मैं नुक्सान हो जाये तो तुम तुम्हारा चेहरा कितने लटक जाता है, तुम १० , २० ओर कभी कभी तो एक महीने तक उदाश रह लेते हो ओर दुःख से भरे रहते हो, उस अर्ध से इतना लगाव क्यूं जब तुम्हे पता है की यह शरीर भी तुम्हे एक दिन छोड़ के जाने वाला है. क्या तुम हंस कर कह सकते हो की "अरे यार, नुक्सान हो गया, अब आगे देखतें हैं."

इसका मतलब यह नहीं की तुम किसी के मातम मैं जाके नाचने लगो ओर पुकारो की "मैं आनंद स्वरुप हूँ, मुझे कभी दुःख नहीं होता." परिस्थिति देख कर अपना विवेक लगाव ओर जो ज्ञान है उसे अन्दर अनुभव करते रहो. उसे चिल्लाने से तुम्हारा तो नुक्सान होगा ही तुम्हारे आस पास वालों का भी होगा. 

यह बोध रहे की तुम एक विशुद्ध आत्मा हो. उस का अनुभव रहे ओर उसमें विलीन रहो. 

एक बार एक यात्री जंगल से गुजर रहा था. उसका सारा ध्यान एक पगडण्डी पर था जिसमें सिर्फ दो पैर रखने की जगह थी. उसके हाथ मैं एक टिमटिमाती टोर्च थी जिसके सेल भी कमजोर हो चले थे. तब उसने सामने एक सर्प को देखा तो वह सहम गया ओर उसके पसीने छूटने लगे, उसने हनुमान जी को बुलाया ओर सबका पाठ किया लेकिन फिर भी उसका भय उसमें धंसता चला गया. तभी बिजली चमकी ओर उसने देखा की वह सर्प नहीं एक रस्सी थी जो एक बाल्टी से बंधी थी. तब एक दम से उसकी हंशी छूटी ओर उसने उस रस्सी मैं एक लात मारी ओर गुनगुनाता हुआ आगे बड़ा. 

  

Monday, May 24, 2010

निराकार हो - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 4

तुम अभी इस वक़्त मुक्त हो सकते हो मगर उसमें एक यदि  लगा हुआ है. यह यदि तुम्हे इस देह से जोड़ा हुआ है.


तुम जब सफ़र पर जाते हो तो सारा सामान पेटी मैं भरकर उसे कंधे पर रख कर, taxi ऑटो या बस से पहले स्टेशन जाते हो फिर ट्रेन के प्लात्फोर्म पर जाते हो, फिर अपने निर्धारित स्थान पर  जाकर  बैठ जाते हो. तब जाके विश्राम लेते हो. यह नहीं के आप रेल गाडी मैं आगे भागते हो ओर उम्मीद करते हो की आप जल्दी से अपनी मंजिल तक पहुँच जाओगे. 

मुक्ति पाने के लिए भी आप को इतनी तो मेहनत करनी पड़ेगी. अपने तमो गुण से बहार आकर थोडा रजो गुण मैं तो जाना होगा, फिर जब थक जाओगे तो  विश्राम करोगे. उस विश्राम मैं मुक्ति अवस्य मिलेगी. क्या आज तक किसी को बैठे बैठे तमो गुण मैं बंधनों से मुक्ति मिली है.

इतनी मेहनत करने के बाद तुम  चित्त मैं आराम करो  तब तुम्हे चेतना की अनुभूति होगी. तभी सुख की प्राप्ति होगी, तभी बंधन से मुक्ति होगी.


न तो तुम यह शरीर हो, न मन हो, न ही तुम किसी वर्ण के हो जैसे ब्रह्मण, न ही किसी धर्म के हो जैसे हिन्दू मुसलमान, न तो किसी श्रम के हो जैसे गृहस्थ आश्रम/वृद्ध आश्रम, न ही तुम आखोँ से दिखने वाले द्रश्य हो .
न तुम करता हो, न ही भोक्ता हो, न ही तुम मान अपमान से प्रभावित होते हो, न तुम धर्मं ओर न ही अधर्म मैं बंधे हो. यह सब इस देह का है, इस समाज का है. उसे अपना कर्तव्य करने दो.
 
तुम सिर्फ एक साक्षी हो. तुम इस शरीर मैं चेतना हो. तुम सब देखते हो. तुम दृष्टा हो. तुम निराकार हो. तुम यह खेल हमेशा से देखते आये हो ओर देखते  रहोगे. तुम विश्व साक्षी हो. स्व का अर्थ होता है जो चल रहा है या घटित हो रहा है , जिसमें कल था, आज है ओर कल होगा. उस हर आती जाती घटना के तुम साक्षी हो.

तुम हमेशा इस शरीरके संग हो लेकिन फिर भी इससे असंग हो.

देखना हमें जनम से आता है, किसी बच्चे   से पूछो की मैं कौन हूँ तो वह कहेगा की तुम यह दिख रहे हो या वह दिख रहे हो. फर्क सिर्फ इतना है की हम भूल जाते हैं की हम देख रहे हैं.

जैसे की एक बच्चे  को वैद्य के पास ले जाओ तो बहार उसका नाम देखकर ही वह रोने लगेगा, क्योंकि उसने सुई लगाने के दर्द को देख लिए है. वैसे ही एक वयस्क डॉक्टर से बोलता है की मुझे गोली वोली नहीं चाईए, बस मुझे एक सुई लगा दो क्यूंकि मैं जल्दी ठीक होना चाहता हूँ.


एक धान के अन्दर चावल होता है, लेकिन अगर तुम अपने को भूसा समझ बैठे हो तो इसमें चावल का क्या दोष. वह तो हमेशा से धवल,निरंजन ओर स्वक्ष रहा है. तुम्हे धीरे धीरे प्रयत्न से इस आवरण को घिसना होगा ओर उस चावल की सफेदी मैं पहुंचना होगा. इस भूसे रूपी शरीर में  मत फंश जाना.

Sunday, May 23, 2010

#irctc - waiting list - cancellation

Indian railways confirms one ticket in a family ticket where two ladies are travelling along with two kids. There were three tickets in waiting list 123 for past month and half.

On the D-day one got confirmed.
What will you do with your travel plans if you got into a scenario like that?

I got a message yesterday night when I was trying to sleep from chunnu saying "Are you awake?". I ignored the message tuned and cursed the banks for sending their promotions late at night.

Moments later I got a call from papa asking what to do in a scenario like this. You love the times in life when you dont know anything but are expected to advise. Mostly such advice gets ignored but you still give. I suggested they go to station and check with the great indian railways ticket collector, the men in black.

Then I called chunnu in acknowledgment of his message. After all the message was not from bank. He informed me that the waiting list tickets get automatically canceled. I had never heard of such event and was surprised to know if such a thing was possible.

I could have canceled tickets then and there and everybody would have had a peaceful next morning. But the devil likes to go to the edge and seeing you scream will allow you to back. I thought lets wait and see till next morning if something can be done.

Next day I got a call at 5 asking what to do. Should we go or not? The scenario is complex because they have to travel nearly 100kms to reach railway station and then if things don't work out go back again. Not a pleasant thing to do on a regular summer day in north India.

I went to the www.irctc.co.in and found the call center numbers. The delhi ones dropped dead, chennai one picked up in sleep voice and he advised "Go to station and find out from ticket collector".

Luckily there is a plan B and they could utilize that.

In plan the same train goes the next day and they have have seating in second class. They were under impression that it takes three days. I told my daughter no, it does not, it takes 2 days. She said "Did you cancel the third day?". I really felt like GOD at that moment. Sometimes your daughters elevate you to mount Everest and you feel in heaven.

Suggestion for Indian railways irctc system. If you confirm waiting list 1234 from a family booking atleast confirm 12 otherwise ignore the booking and give the seating to waiting list number 5. It could be a cause of some pain to lots of stakeholders involved. Thank you.

मध्य मार्ग - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 3

अति मैं इंसान परेशान हो जाता है. इतना काम मैं विलीन हो जाये ओर  फिर थक जाये या फिर इतने आलस मैं रहे की सिर्फ अपना वजन बडाये. इसलिए मध्य मार्ग मैं चलो.

जब हम पैदा हुए थे तब चार किलो के थे ओर अब ६०, ७०, ८०, ९०, ओर कोई तो १०० किलो का भी हो गया है. यह वजन अन्न से आता है. पञ्च तत्वों मैं पृथ्वी हमें वजन देती हैं. अन्न से मन भी बढता है.

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के यहाँ पांच साल तक सूखा पड़ा तो वह बहुत परेशान रहा. फिर  बारिश हुई, फसल आई तब भी वह दुखी था. किसी ने पुछा क्या हुआ मुल्ला, इतने दुखी क्यूं हो. उसने कहा "अब फसल काटनी पड़ेगी, मेहनत करनी पड़ेगी".

सत्य  लेकिन इन पञ्च तत्वों से परे है. इस मृत्यु लोक मैं सब काल से परे नहीं है. पेड़ भी आते हैं ओर जाते हैं. शरीर भी आता है ओर जाता है. यह पञ्च तत्त्व मिल के कई प्रकार के प्राणी बनाते हैं, वह भी आते हैं ओर जाते है.

एक तुम्हारा चित, तुम्हारा चैतन्य,  काल से परे है, वह हमेशा से था, है  ओर रहेगा. अगर तुम चित बोध को शरीर का साक्षी मान लो तब तुम्हारी पीड़ा कम हो सकती है, बंधन मिट सकतें हैं ओर मुक्ति की इच्क्षा प्रबल हो सकती है.

साक्षी  बनकर तुम सहजता से समन्वय मैं रह सकते हो. तुम दया ओर क्षमा के करीब हो सकते हो. दया मैं तुम क्रोध से दूर रहते हो. क्षमा तुम्हें सबके करीब रखती है, खुद के भी. कभी खुद को भी माफ़ कर के देखो.

पृथ्वी कितनी दयालु है, तुम उसे खोदते हो ओर वह पानी देती है. कहती है लो बेटा पानी पियो, फिर खोद लेना. क्या वह तुम पर क्रोध करती है की क्यूं मुझे कस्ट दे रहे हो? 
किसी से कोई गलती हो जाये तो उस पर चिल्लाने से क्या वह गलती सुधर जाएगी या मिट जाएगी? क्या तुम हंस कर कह सकते हो कि "कोई बात नहीं, चलो इसे मिल कर ठीक करतें है."

संतोष तुम्हारे पास है. उसे इधर उधर क्यूं ढूँढ़ते हो. इस सत्य को समझो ओर अनुभव करो.
एक साथ जब सब एक सब्द का उच्चारण होता है तो उसे भजन कहतें हैं. सत्संग मैं हम सब एक साथ हरि नाम भज ते हैं की नहीं.  
पूजा करते समय अगर भाव न हो ओर ध्यान कहीं ओर हो तो ऐसी पूजा से नुक्सान ही होगा.


What is happiness? Happiness is when you tend to flow along with life. Its not a moment in past neither its in memory. When you fallback to memory that is a sign that you are sad and you have stopped living. So the question "What was the moment in your life when you were most happy?" does not have any relevance. You are seeking to shake the dead. Happiness begins with sharing, when you just cannot suppress the desire to give.

Sometimes you may be tired and frustrated with doing seva. Body and mind can get tires. Give them rest, विश्राम दो उन्हें, साधना करो, प्राणायाम करो. Recharge and then come back but remember no excesses in life, live in balance like you ride the bicycle, the more you bent towards worldly or spiritual life the more distress you will have. But you are able to strike and balance then the ride becomes natural and effortless.

क्षमा, दया , संतोस, ही वह सत्य हैं जिनका तुम हमेशा भज करो.

Saturday, May 22, 2010

Ignore everybody

Can you?

I was introduced to @gapingvoidart by a tweet from @jaishankarj
about the book Ignore everybody.

I thought it was a casual read but then I was hooked. First thing I noticed was "You were getting 25% free to read and then you could take your buy decision."


I read the 37 quotes in one go. Then I wanted to get insights into more and went ahead and read the rest of the stories attached to the quotes.

The ones that touched me were
  1. Nobody cares. Do it for yourself.
  2. The idea doesn’t have to be big. It just has to be yours.
  3. Worrying about “Commercial vs. Artistic” is a complete waste of time.
  4. Everybody has their own private Mount Everest they were put on this earth to climb.
  5. If your biz plan depends on you suddenly being “discovered” by some big shot, your plan will probably fail.   
  6. Which ones touched you, please leave in comment.
Then I was mesmerised by the cartoons for their simplicity and straight face. They were cryptic at times but the words charmed. I am more attracted to written word than a rough sketch and so I was hooked to the art because of the words it carried.

I read his bio and now I have become his follower. Do you follow @gapingvoidart.

Friday, May 21, 2010

A commentary on Ashtavakra Geeta by Sri Sri Ravishankar Gurudev ji

सम्मान जहां होता है वहां कुछ दूरी भी होती है, स्नेह जहाँ होता है वहां सम्मान मुश्किल से मिलता है. हिंदी मैं एक कहावत है "घर की मुर्गी दाल बराबर ", अपने परिवार जनों से प्रेम तो बहुत है लेकिन उपेक्षा भी उतनी होती है.  इसलिए कृष्ण भी कहते हैं की "हे अर्जुन, तुम मुझको प्रिये हो इसलिए मैं तुम्हे भगवत गीता सुना रहा हूँ ". उसी प्रकार अष्टावक्र भी कहतें है "हे तात " अर्धात "तुम मुझे प्रिये हो इसलिए मैं तुम्हे अष्टावक्र गीता सुना रहा हूँ."

आप अपने प्रिये जन को ही गीत सुनाते हो, न की दुश्मन को. एक राजा जिसके सामने सरे राज्य की दुःख दर्द की दास्तान पड़ी है वह साडी उम्र उसमें जकड़ा रह सकता है. या तो उसे पता छल जाये की यहाँ झूझने से कोई फायदा नहीं हैं. ओर मुक्ति की ओर चले या फिर चुप चाप ओर एक जन्म काम, अर्थ ओर धर्म मैं समय व्यर्ध करे.

एक प्यास जगनी होगी. एक तड़प. वही तुम्हे मुक्ति की तरफ खींचेगी . बैठे बैठे कुछ नहीं मिलता है ओर न ही पोथियाँ पड़ने से ज्ञान आता है. उससे मिलो जिसने ज्ञान को अपने मैं ढाल दिया हो. अगर उसने तुम्हारी ऊँगली थाम की तो कुछ हो सकता है. जरूरी नहीं की तुम सारे  बंधन से एक एक करके निकलो,  तुम देख कर भी समझ सकते हो.

अष्टावक्र को देख कर राजा जनक के मन मैं एक साथ सम्मान ओर स्नेह उठा ओर उन्हें आनंद हुआ. कई बार संतों की उपस्थिति मात्र से हमें सब मिल जाता है. यह बात बुद्धू से भी बढकर बुद्धू जानता है. 

विषयों को विष मान कर त्याग दो. जिन्हें शक्कर की बीमारी होती है उन्हें शक्कर विष के सामान प्रतीत होती है. जब किसी चीज़ की अति हो जाती है तब मन उससे मुक्ति चाहता है.

अष्टावक्र कहतें है "यदि" इच्क्षा हो मुक्ति पाने की तभी मुक्ति मिलेगी. उसके लिए पहले स्वीकारना पड़ेगा की तुम बंधन मैं हो, अगर नहीं हो तो मुक्ति पाके क्या करोगे. अक्सर तुम्हें खुद पता नहीं होता है की तुम बंधन मैं हो. इसलिए शरीर की सुनो, उसकी पीड़ा को समझो.

लोग संसार के सम्बंदों से भाग कर ऋषि बनते हैं लेकिन वहां चेलों से परेशान हो जाते है. दुःख उनका पीछा नहीं छोड़ता. एक बार श्री राम जी के राज मैं किसी ने एक कुत्ते को बहुत मारा तो वह रोता हुआ रामजी के दरबार मैं पहुंचा. श्री राम ने कहा की इस मनुष्य को क्या दंड दें तो उसने कहा इसे किसी आश्रम का मठ निर्धीक्षक बना दें. उन्हों ने कहा ऐसा विचत्र दंड क्यूं. तो उसने कहाँ की मैं भी पहले वही था.

एक बार गुरूजी कुम्भ के मेले मैं गए. वहां एक मुनि को देखा जो वस्त्रहीन था ओर अपने सारे  शरीर पर भस्म लगाये हुए था. गुरूजी ने कहा की महात्माजी  कुछ ज्ञान की बातें बताईये तो उसने "हूँ हूँ " कहकर कहा की "तुम्हे ". तब गुरूजी समझ गए की जीवन मैं क्या नहीं करना चाईए. उसके शरीर के कण कण मैं तनाव भरा पड़ा था. वह ३०-४० साल से तपश्या कर रहा था. उसने कहाँ "मैं अपनी जननेन्द्रियों से एक ट्रक खींच सकता हूँ ". ट्रक चलानें के लिए तो एक चाबी मात्र ही काफी है.

एक बार एक मुनि अलाहबाद मैं किसी के यहाँ रुके. वहां एक बुजुर्ग को बहुत कस्ट था. उसके बेटे , बहु  ओर सब उससे बहुत तंग करते थे ओर घर का सारा काम करवाते  थे. मुनि ने सोचा उसे इस बंधन से मुक्त करते है ओर आश्रम आने का न्योता दिया. वह भड़क गया ओर क्रोध मैं बोला "क्यूं मेरा घर बर्बाद करने पर तुले हुए हो. मेरे मुन्ने का कौन ख्याल रखेगा, कौन उसकी चड्डी बदलेगा. "

विदेश मैं एक बीमारी होती है जिसमें लोगों की पेट की भूक तो मिट जाती है लेकिन मन की इच्क्षा नहीं मानती है. वो खातें हैं फिर उलटी करते है, फिर खातें हैं. शरीर की पाचों इन्द्रियों की एक सीमा होती है जिसके आगे उन्हें पीड़ा होती है. उनकी भी शरीर मैं खाने की  नली बर्बाद हो चुकी है, कोई इलाज नहीं पर फिर भी वह शरीर की सुनते नहीं ओर मन जो असीमित है उसकी इच्क्षा पूरी करने चलें है.

इसलिए इंसान को "अंतर्मुखी  सुखी" सूत्र का पालन करना चाहिए. बहार ध्यान रखने से शरीर धक् जाएगा ओर पीड़ा मैं रहेगा. तब परेशान होके "अगर " मन हुआ तभी मुक्ति की ओर अग्रसर होगे.
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Will you #pool to #office,#mall,#trek or spiritual discourse?



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Thursday, May 20, 2010

#punga with @sramana in #1m-1m

Not really. It was back to basics advice.
  1. Stay focused. What is the problem? Does it really exist? Can you solve it?
  2. Segment your market and choose a line of business.
  3. Validate your real customers. Cold call. Meet on roadside. Find ways to cut across to them and say hello. Are you talking to the right audience?
  4. Grow a single line of business and then go for aggregation as value add.
Bottomline - Go everywhere 

Backgroud : It was fun evening. I did not have calling card. Luckily chatted with a friend in US and he said his folks had it here on 7th floor. I got the magicjack. Struggled with it till 7:45 with no luck. Only ringtone was the saving grace. No magic with magic jack. It was not my day to save money on calls.

I had done my validation during the day and people suggested skype credits for good quality call. So at 7:50 I went and grabbed my credit and started punching the numbers, more than eager to lose the moolah, but skype rejected the card 5 times.

Once you believe that your spent is worth the time then you will go to any extent to burn the cash. I went to odesk, withdrew some money to paypal. I hate to do it because in last withdrawal paypal took away a cool 4% on large amount without warning. Okay, I was ignorant slob.

Then I went back to skype with paypal power. Paypal is all over the place in skpye credits buy page. Every page they beg to go buy with paypal. I could sense their pain and went to odesk to find the balm for them. It worked. I blew $10.

I dialled dimdim and the code was smartly rejected. Their customer rep came online and took away more time to dial me into the call.
It is then that I realized the call was at 8:30 and here I was dialling in at 8:15 happily being told to be on mute. I cut the call and prayed to lord.

Came back at 8:30. Again dialed in using skype. I started hearing two voices. Did not know what was happening. I stopped the call in skype. I heard one voice and was happy. Then went to skype to search for *6 because my turn would come soon and I would have to use that. It was not to be seen anywhere. How could it show when there was no call using skype? The sound was coming from the webcast.

As my turn came , I went back to skype to dial number. Bingo, again two voices. But with kevin's help found out the stop play button against his name only. I searched all over the page for STOP button but could not find it. The web voice stopped.

My turn came and I did present my idea. Dont ask me what because I will discuss with you only after I have validated it.
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Monday, May 17, 2010

How will data make sense?

Data is flowing in every direction and in every possible way. How do we use it to make effective decisions? How can it help us live a better life?

Job portals have tonnes of resumes. How can a company reach out to most likely job prospects? How can job prospects reach out to the right fitment?
How many times will you repeat shooting in the dark each time a recruitment requirement is thrown across to you?

Mobile Operators have tonnes of SMS'es floating across. How can they put the content in context of the user who is sending it? How can they better their service and improve user experience?

I get the same promotion three times a day and every day of the week. Why cant the system learn that this user is not interested in this offer at this moment of life? 

In every stage of life we are in need of certain things. How can the services around you learn your need and send across the appropriate content and offer to meet them?

How effective is mass mailing, mass SMS'es campaigns?
How many times have you made a buy decision made on the SMS offer that you got?

How can the need and the offer align? How can they orient  towards each other and produce a rhythm that is not Noise?

Saturday, May 15, 2010

How do you network at networking event?

You say
Hi, I am Dhaval.
  You get - Ah Hi, I am so and so.
Sometimes there will be awful pause. Sometimes you will be hungry to spit out something like
   "I have this great ideas and I wanted it validated. You have been in this business for so long. Can you obtain your valuable advice for free?"
  If you are lucky you can get , "Yes, Why dont we meet sometimes later at leisure so that we can do justice to your idea?"
  If you are not then you will be thrusted a visiting card and the reciever will switch over to more activity elsewhere.
  There could even be curiosity from other end and you could get "So, what do you do?"
You were waiting for this and you start 
 "I am freelancer. I mostly develop apps on Google app engine, essentially in python and sometimes in java and google scripts. My focus is integration app that talks to various APIs offered from Google Data/Docs/Analytics/Adwords, Facebook, Twitter, Salesforce, Zoho"

Till then you would have reached your dead end and then you give "So what do you do."
  "I am IT consultant or I own this company for last three years or I have a day job but I am interested in mobile apps and how to make money out of it?"
  Sometimes you will get. "Heres my card and heres my brochures. Thank you."

You are again left stranded waiting for your next meal.

By the end of day you are too tired and just want to hit the road and go home.
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How will your mobile app make money?

You have developed a wonderful mobile app. You rave. You tweet. You blog. You carry it everywhere. Why is nobody buying it? Even your best friend are not ready to release Rs 50 to buy it. Forget your friends, your spouse is not keen to even have a look at it.

What did you miss my friend? You have missed the end users. Your application is only 20-30% technical problem. The rest 70% is how you present it to the world, how to do market it, how do you know it really solves the problem your end users are currently facing. Its not a script that you wrote 10 years back and now converting into a movie.

Why is it that less than 2% of developers on appstore make money? What did the rest do? How did they lose it? Its a simple lifecycle. You buy a Mac, a iphone , create a app, abide by appstore guideline and there it goes and gathers dust in some corner of appstore.

Did you classify your app? Is your app used by the user once in his lifetime? Is it used by him intensely in his honeymoon period and then dumped for spirituality? Is it being used once in a while when the need arises? What is the pattern of usage for your app?

Will your app be free or freemium or user pays for newer content as and when it gets delivered? Will your app be freely downloadable from operator's appstore and lead to other applications that are paid for upfront?
Do you think your operator will share revenues with you? Can you expect to make more than a percent or two from your operator? Will you survive with that percent?

Will you be developing the app as one time one hit hindi movie hero or are you planning to deploy 3-4 apps per quarter?

Can your single app be your lifesaver and give you revenues for rest of your life?

Did I do justice to the title of this blog? You will have to go there and find your market. It is your application. It is your market. Unless you belong to the lucky tribe.

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Appjam 2010 , the after effects of Atul Chitnis keynote

The default Home screen of the iPhone shows mo...Image via Wikipedia
I am the greatest proponent of open source but I have bills to pay. How will my app pay it for me?
Audiences was the only word that the slide had on the big screen.
Next billion users was on next slide.

Users was on next slide.
Marketing on next slide.

A presentation where the slide had a word or two at the most. Only Atul Chitnis could make sense out of them and he did in his keynote address at appjam held at IIMB, Bangalore on 15th May.
You have to keep your audience in mind.

The next billion users will come on mobile and most of them are not coming from the PC/Computer world.
Your user does not care about technology nor is he interested in the buzzwords. All he wants is a real time app which is easy to use and does what he paid it to do for him. Your user is not tech-savvy nor is he is a developer. They are neither enterprise users who use the mobile device as extension of their desktop.

Apple has controlled the appstore. The quality control has ensured that iphone/ipad apps are virus free and sensitive to the native culture in which they are deployed. Appstore also ensures that your application has reach to millions of users. It is your marketing that will sell the application.

It is easy to buy apps for few cents because you know they are tested, they are virus free and in case you are from PC world you would hesitate to pay but then you will also be insured from bad software ruining your device.

iphone apps sold because they give near-realtime experience to end user. They dont run on browser. They are native application. They may connect to backend through EDGE GPRS etc., but that is occasional. Browser apps will not work on mobile devices. They are too slow and most operators will not be able to give the speed to make it real time user experience. The user will and has dumped browser based apps. Proof, iphone apps and appstore.

If you have a short-term to near term time horizon then focus on iphone OS + Nokia Ovi+HP/Palm OS.
Android future might begin next year. Windows phone OS does not have API and RIM/Blackberry is too difficult for app development and deployment. The Android apps are not compatible between there minor version and they are free. Android is focused on selling devices then how will you make money there?

You can follow @chitnis on twitter and visit him at atulchitnis.net. All the above sentences are inspired from his keynot at APPJAM and I am not a promoter or beneficiary of any of his applications or businesses. I saw the guy and heard him for the first time :)

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Sunday, May 09, 2010

What happens in startup networking event?

A segment of a social networkImage via Wikipedia

Startup saturday is organized by headstart.in on every second saturday of every month for the past few years. Headstart.in is a great initiative by a group of go-getters about few years back. The venue is mostly a conference room in IIMB bangalore as the initiative is supported by NSR Cell.

I have soaked my hands in freelancing for about a year and felt qualified to attend such a meet.
My nerves betray me when I try to get social. This time I was adamant to push my luck.
I have been alone for so many days. No team in physical form around. Social isolation. Lost connection with regular job goers and their pristine topics.
Facebook was constructing their social graphs and what was I doing here in isolation?. A man alone in single island is good for a few days but then you need to ride the dolphin/shark/whale based on your luck and your accompanying stars.

And I bit the social bullet and here are few glimpses.

If you are not used to it then it could be ample road rollers around you. But if you are then you sail through.
The sequence of sentence can go like this
"Hi, I am Dhaval, a freelancer, into web based projects.".
"I am a freelancer into open source."
"I get my work online and deliver it online."
"I have been in IT for 10 years."
"I mostly take python/django based projects. But have done Google scripts and other integration with Google data APIs and salesforce etc.,"
Not many survive till the last pitch line as there is bound to be somebody crashing into the other guy or you wanting to go to other guy or "lo and behold" something pounding on you too and you lose your clue. Me, I dont believe it. But I love it.

or there could be somebody who says

"I am a socialogist. I take sessions on sexuality in schools and colleges."
"I have had two rounds of funding. I have crores in my order book and I dont give a damn to big names."
"I am established and have a business. I came here to enable the strugglers and show them the light at end of tunnel without stumbling on the same rocks as me."
"You are my prosperous customer. Why dont  you buy my services?"
Somebody was hiring but I just could not meet them.

Then you get to witness fantastic speakers.
A lady from altius consulting who uses parables/fables as tools to communicate and conceptualize a marketing strategy for startups for a reasonable fee.

Few quotes
  • You and your friend in jungle of startup being followed by a disruptive innovation called as tiger. You only have to outrun your competition, your friend in order to survive. Ignore the jungle and rest of animals and their kingdom.
A gentleman from 2020 social media company urging us to focus on customer before doing the startup roller coaster.

Few quotes, they are distorted because I do not recall the exact verse
  • A founder creates a powerful distortion field around his idea. He inspires co-founders and his stakeholders to believe his version of distortion. 
  • Know your customer before you write single line of code. Know what he will pay and why will he come to know.
  • Listen to your customer and include their feedback in your business.
 Startup buddies -
A initiative to group people doing diverse startups. Allow them to brainstorm and meet on regular basis to keep the momentum going.
1m-1m -
Introduction to Sramana Mitra's initiative to create a million startups having million dollors revenue.

In the society in which we live in where youth pursuing ventures are treated as social morons, a much needed relief to know that I am not the only one who is drugged.

Disclaimer:
I am not a efficient networker. This is not a inside scoop.It is only a reaction from a first time visitor in the jungles where startups dare to dwell.
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A miracle in name of Chinnamma

WeddingImage via Wikipedia
She is 34. She looks like 54. You cannot get thinner than her. She is bare bones. She is household help. We mostly call her "काम वाली बाई "or "अम्मा " or "Aunty".
She works in an apartment complex and lives nearby in a small house. She has raised two kids and helped them with education. Now they are young adults on verge of employment.
She does work in three houses. She takes care of one of the house for the whole day. She has been doing it for the last three-four years.
She has work ethics, is honest, does not demand a pay hike nor better working condition. She does not complaint about excess workload. She does her work, efficiently and regularly, everyday of her life. She simple takes what is given. She does not expect more, nor in words nor through indirect actions.
She will come to your house at 8, 10, 12 and 18:00 to check if you are there in case you go out anywhere during the day.
She is a true believer and has complete faith in God. A complete कर्मयोगिन. Her only sentence in adversity and when cornered is "He is seeing everything. He will take care of everything."
She had to leave her house in the village somewhere in chittoor, Andhra Pradesh. Her husband brought another lady twenty years after her marriage and two kids. He and her in-laws harrassed her for twenty years of her youth. She was twelve when she got married.
She studied till PUC which is 10+2 when she was with her parents. Her childhood was in a farmers family. They  had many acres of land. Her father gave 20 hectares of land and hundreds of grams of gold as dowry in her marriage.
She came to Bangalore straight out of her village for the first time with her kids. She has created a living through her honesty and perseverance. She has the will to live and strength to survive. She has honored the life bestowed onto her with a stable and steadfast value system.
She does not need a corporate training on soft skills nor she needs a plaque put across her desktop proclaiming the value system of her organization. Reminded through several emails from top-middle-lower management about the organizations ideal.
She is a living legend and she works in your household. 

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Friday, May 07, 2010

How do you learn?

Learning happens when you are free.

If you are attached to a belief or a system of predefined procedures then learning will not be easy on you. You will be strained beyond your means and there will be tremoundous effort on your faculties to get into the rhythym of learning.

Its like playing musical chairs. You are attentive to the music. You are attentive to the chairs and people ahead and behind you. Yet you dont stumble, hit or slip away. You are there and you are flowing to a rhythym. You are focused and your body and mind complex is continously adapting to the changing environs. You are nerves but you are constructive and have a smile on your face.

An idea exchane is an event in which ideas are spoken as well as heard. Its not the metro heading towards you in full steam and crushing you under its weight. Its like rowing where you are trying to go upstream. There is some resistance from the stream but there is also assistance. When you row the stream listens to you and allows you to go up. When you listen carefully to the stream you can find a path of least resistance. You learn a new way to navigate.

The next time you meet somebody. Ask yourself?. How do I learn? How do I learn from my fellow commuter? What do I learn from my housemaid, the security guard, the CEO, the writer, the actor? Are they inaccessible to me? If yes then why? How do I make mhyself accessible to them?

I can learn in a formal structured place like school or a corporate. The only disadvantage is that the creative people who made such institutions have left. They have left behind a system of processes and repeatitiveness that can only make you a menial robot if not more.

Your learning opportunities lies elsewhere in chaos where your methods will be challenged and disrupted. Dont fear them. Embrace them.

Its imperative that I learn. Its imperative that it has to be spontaneous.

What did you learn from above?
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Inspired by the article at http://www.connected.org/learn/Learning-moments.html

Why does a terrorist deserve media time?

He took the nation for a ride. He bludgeoned ordinary folks doing their everyday routine. He played with scores of human life and terminated them mercilessly.

You spent crores of rupees for over a year in the name of fair trial, giving him exclusive jail room, manpower to protect, special judges and sessions court.

How did you get that money? Through the taxes that the people killed paid to you for better part of your life.

Why does TV media walking around in every nook and corner of country and world trying to ask people
Does he deserve death or life? What sort of silly question is that?

What kind of world are we living? Why do we encourage such media coverage?
Why should be proud of home minister who gives kudos to judiciary who took away time from crores of cases pending in its cupboard to attend to this one?

And today you have all the media hampering for sound bites and again following a judgement into the case of two filthy rich brothers over distribution of gas?

It is painful to see and observe that we allow terrorists, rapists, corrupt to occupy the TRP's of Indian news channel.

Is it not possible to cover movements that uplift society? Is it very hard?

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