Saturday, June 19, 2010

लयम वृज - live ashtavakra geeta by Sri Sri RaviShankar ji

भाव में मस्त रहो लेकिन बिना होश खोये. अष्टवक्र कहते हैं "लयम वृज", लय में रहो. दिल की सुनो. भाव की तरफ भी ध्यान दो. जिस प्रकार संगीत में पकड़ होती है की वह अपनी धुन में हमें भुला देता हैं, हम डूब जाते हैं उसी तरेह ज़िन्दगी में चलते रहो, बड़ते रहो, जो मकसद चुने हैं पूरा करते रहो लेकिन चलते चलते यह न भूल जाओ की तुम किसी एक घटना या दृश्य से चिपके हुए हो.


जैसे शीशे में हम अपनी तस्वीर देखतें हैं, सचते सवार्नते हैं,  अगर कहीं हम उसी तस्वीर से चिपक जायें ओर उसे ही एक मात्र सत्य मान लें तो फिर हमारा विकास नहीं होगा ओर हम अटक जाएँगे ज़िन्दगी में. शीशा कभी किसी के दृश्य को अपने में चिपका कर नहीं रखता है, जो भी आता है उसे वही दिखता है ओर आगे बड़ते रहता है. उस शीशे की तरेह बनो. सजो , मस्ती करो, सवारों लेकिन उन दृश्य में न खो जाओ. तुम दृष्टा हो.


लेकिन जब वह दृश्य घटित हो तो उसमें पूरी तरेह डूब जाओ, जैसे इसका कोई अंत न हो. उस दृश्य में जो मस्ती है वह सारी अपना लो. ओर चलते रहो. लय में रहो.


यह घटनायें समुद्र की लहरों की तरेह होतीं हैं, उन में उछल, खुद, मस्ती होती है ओर फिर वह उस गहरे समुद्र में समां जातीं हैं. कुछ क्षण मात्र का विश्राम होता है ओर फिर उछलती हैं. तुम भी झूमो, गाओ. इस अनुभव को ही सत्य जानो.


सत्य के कई आयाम होतें हैं. ओर हर आयाम में वह सत्य होता है. अंत में सिर्फ एक सत्य होता हैं लेकिन सफ़र में वह कई रूप में आता है. तुम्हे लगता है वह अलग है लेकिन उसका स्वरुप देखो तो स्वाभाव एक ही होता है.
पहले कहा की सिर्फ साक्षी रहो ओर अब कहतें हैं की लय में मस्त रहो. बुद्धी को तर्क चाहिए इसलिए उसे साक्षी दिया, दिल को रस चाहिए इसलिए उसे लय दी. अब आप किसी एक को लेके तो नहीं बैठ सकते. दोनों के बीच का मद्ये मार्ग आप को होश में भी रखता है ओर लय में भी.


जैसे सुख दुःख. सुख की चाह में दुखी रह  सकते हो या फिर सुख चला न जाये उसमें दुखी रह सकते हो या फिर दुःख में कहीं ओर दुखी न हो जायें इस भय में ओर दुखी रह सकते हो. लेकिन क्या तुम हमेशा सुखी या दुखी रह सकते हो. क्या दुनिया के सारे लोग चोर हैं, ४२० हैं, या सारे सज्जन हैं.
क्या कभी साइकिल पूरी तरेह एक तरफ या दूसरी तरफ हो कर चलायी है. अगर हाँ तो आपका एक पांव या दूसरा पांव दर्द से परेशान हो गया होगा या फिर दोनों पांव अगर दोनों का सहारा लिया हो तो. साइकिल सीखते वक़्त हम एक या दुसरे तरफ गिरते जरूर हैं लेकिन फिर उठके उस मकाम तक पहुँच जातें हैं जब न तो हम अधिक दायीं ओर न अधि बायीं तरफ होतें हैं, मध्ये मार्ग में संतुलन होता हैं, चलने की मस्ती होती है, सतर्कता होती है, सरलता ओर सजगता होती है. वह तुम्हारी मंजिल है ओर वह तुम्हे अभी उपलब्द है.


पाचों तत्वों में पाचों तत्त्व मौजूद हैं. आपके शरीर में ९८% आकाश तत्व है. आपकी त्वचा को microscope में देखो तो वह मच्छार    दानी की तरेह दिखेगी. उसमें से २% बचा जिसमें ७०% पानी हैं. उस पानी में भी आकाश है. अब आप ही सोचो की आप एक तरंग हो या फिर एक ठोश वस्तु हो. आपके सामने ओर आस पास जो लोग दिखतें हैं, उनका आकर होता है, उन्हें छु भी सकते हो लेकिन फिर आधुनिक वैज्ञानिक जो पता किया है आकाश तत्व के बारे में क्या वह गलत है? यह सत्य अष्टावक्र हजारों वर्ष पहले कह गए.  हमारे भी इतने जन्म निकल गए ओर अभी तक क्यूं नहीं जान पाए?

Thursday, June 17, 2010

ईस्वर अनुभव क्या है- live ashtavakra geeta by Sri Sri Ravishankar ji

गुरु  ओर शिष्य में क्या अंतर है?
गुरु पूर्ण है ओर शिष्य खाली है. 

ईस्वर का अनुभव कैसे हो?
ईस्वर किसी सवाल का उत्तर नहीं है. आप यह नहीं कह सकते कि यह है या वह है. वह आपके प्रश्नओं का समाधान है. वह विराम है. उसका अनुभव ठहराव में होता है. आप भागते रहोगे तो उससे दूर ही रहोगे. आप थम जाओगे तो वह अनुभव हो जाएगा. 

उसका स्वाभाव है प्रेम ओर शांति. उस स्वाभाव तक पहुंचे के आपको ध्यान में शांत होना होगा. प्रेम में विलीन होना होगा. संपूर्ण समर्पण कि स्तिथि में  आप उसके स्वाभाव के करीब होगे. उस मौन में उसका अनुभव समाया है. 

यह शांति आपको किताबी ज्ञान या श्रवण मात्र से नहीं मिलती है. इसके लिए आपको गुरु के सनिध्ये में होना होगा, उनकी शांति में अपने स्वरुप का अनुभव करना होगा. इससे आसन तरीका कोई नहीं. ऐसे समर्थ गुरु बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, अति दुर्लभ होते हैं, ओर कई जन्मों के प्रयास के बाद उनका संग मिलता है. 


आपने किताब में पड़ा  के तैरना कैसे सीखे. आपने कुछ चित्र देखे. आप सीख कर किसी को सुना भी दिया. लेकिन अभी तक आपने पानी में डूप्की लगाने कि हिम्मत नहीं जुटाई. न आपको उस किताब कि तकनीक पर यकीन हुआ ओर न ही उन चित्रों पर ओर न ही उन सारे मित्रों पर जो आपको  तैर के भी दिखा दिए. आपने किसी को समर्पण नहीं किया ओर साडी दुनिया को बताते रहे कि ऐसे तैरते हैं. ऐसा गुरु बनकर कितने लोग आप पर एकिन करेंगे. कितने दिन आपकी बात छुपी रहेगी.
एक बार एक नाव से एक आदमी गिर गया. उसे बचाने के लिए ओर एक आदमी कूदा ओर उसे बचा लिया. सबने बचाने वाले कि बहुत वह वह की. लेकिन वह आदमी क्रोधित दिखाई दिया. सब हैरान थे की इतना नेक काम करने के बाद भी वह क्रोधित क्यों है. उसने कहा के पहले मुझे यह बतायो की मुझे पानी में ठकेला किसने?


आप जड़ ओर चेतन के बीच में मनुस्ये रूप में डावांडोल हो रहे हो. कभी आप जानवर जैसा व्योहार करते हो ओर कभी देवत्व जैसा. एक जगह टिक नहीं पा रहे हो. उस चिन मात्र की सत्ता को पकड़ नहीं पा रहे हो. एकाग्रित नहीं हो पा रहे हो. विचलित ही रहते हो. 
पत्थर के ऊपर जूता मारो या फूल चडाओ उसे क्या फर्क पड़ता है. आप जब तक जड़ हो तब आप कहो की किसी के कहने बोलने से मेरे ऊपर कोई नहीं फर्क पड़ता तब आप मुर्ख ही रहोगे. लेकिनजब आप देवत्व को प्राप्त हो जाते हो ओर कहते हो की यह सब अपने हैं ओर इनकी बातों का मुझ पर असर नहीं पड़ता तब आप चेतना के समीप होते हो.
  
आप जब बनते हो तो तीन गुण आपको अधीन करते हैं. एक लोभ, एक भय, ओर एक प्रेम. यह तीनों में से कोई एक आपकी करनी का कारण होता है. आप जिसकी मात्रा बढाएंगे उसी हिसाब से आपको फल भी मिलेगा. 

आप अपने भीतर झाँक कर देखो की आपके अन्दर किसकी सत्ता है. क्या आप अभी भी भिग्मंगों की तरह साडी दुनिए से अपने लिए कुछ मांगते हुए नज़र आते हो, की मुझे क्या मिलेगा, इससे मेरा कैसे फायदा होगा. या फिर आप यह सोचते हो की मेरे पास जो किस है उससे दुनिया में किसका ओर कैसे फायदा होगा. 
मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ओर न की तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो.


आश्रम का नियम है की यहाँ पे आओ तो यहाँ अपने दुःख छोड़ के जाओ. एक बार एक महिला मैं कहा की मैं अपनी सासू माँ को यहाँ छोड़ के जाना चाहती है. क्यूंकि वह मुझसे रोज झगडती हैं. इसका निवारण दो तरीके से हो सकता है. एक तो आप उन्हें आपनी माँ का दर्जा दें ओर जैसे अपनी माँ के अंचल मैं झगडे के बाद पहुँच जातीं हो वैसे ही उनके अंचल की लालसा रखो. या फिर हर दिन एक नया कारण ढूँढो झगडे का. पुराणी बातों को नहीं दोराहो. उसका मजा है , क्यूंकि पुराणी बातें आसानी से आती हैं ओर नए कारण मुह्किल से मिलते हैं.

Sunday, June 13, 2010

ब्रह्मचर्ये एक घटना है - live ashtavakra by Sri Sri Ravishankarji

आत्म ज्ञान पाने कि कोई शर्त नहीं होती,  यह बेशर्त ही तुम पा सकते हो. तुम वर्तमान समय मैं निर्दोष हो. तुम इस वक़्त अपने कर्मों के फल से भी मुक्त हो.
लेकिन अगर तुम कहते रहोगे कि नहीं मैं गुस्सेल हूँ, नालायक हूँ, बद्तमीच हूँ, दीन हूँ, निर्दयी हूँ, पापी हूँ, तब तुम वही रहोगे. तुम्हारे मन को तुम्हारी दीनता सुन्दर लगती है, लेकिन तुम्हे इससे ख्ब्राहत होती है, डर लगता है, क्यूंकि यह सुन्दरता अब मलिन हो गयी है. 
ध्यान के बाद बाद तुम्हे गुस्सा तो आता है लेकिन वह आ कर चला भी जाता है. उसमें ठहराव   नहीं है. और ध्यान करोगे तो शायद एक दिन ऐसा भी आएगा कि गुस्सा तुम्हारे आस पास भी नहीं आएगा.
कुछ लोग आत्म ज्ञान पाने के बाद भी काम वासना से बच नहीं पाते, यह कितने आश्चर्ये कि बात है. 

कितने जन्मों से हम अपने अंगों से आसक्ति बनाये हुए हैं. कुछ लोग तो बुडापे में भी जनेंद्रियोँ के अधीन होतें हैं. वो मन से गरम और तन से ठन्डे होतें हैं. हमें ध्यान मन से ठंडा और तन से गरम बनता है. 

हमारे पैदा होने के साथ ही हमें माँ के स्तन में आकर्षण होता है, क्यूंकि हमें वहां से दूध मिलता है. तमिलनाडु मैं एक देवी हैं जिनका नाम ही है "बड़े स्तन वालीं". सती के ५२ अंग भी ५२ जगह पर गिरे और वहां शक्ति पीठ कि स्थापना हुई. यहाँ पर नारी के ५२ अंगों कि पूजा कि जाती हैं, उनमें नाक, कान, जनेंद्रियाँ आदि सब हैं. हम लोग शिव लिंग को भी सदियाँ से पूजते आये हैं.

हमारी संस्कृति हमें अंगों को प्रणाम करने को कहती, उन्हें नमस्कार करने को कहती हैं, उनका सम्मान करने को कहती है. जब हम किसी का सम्मान करते हैं तब उसकी निंदा कैसे कर सकते हैं.  तब हम उनमें आसक्त नहीं होते हैं.

किसी भी अंग मैं खो जाने और दिन रात उसके बारे मैं सोचना वासना है. मन सुन्दरता कि और भागता है. मन को जो सुन्दर लगता है वह उसका ही विचार करता है. अपने विचारों कि ओर ध्यान दो और बुद्धी से पूछो कि इसमें क्या सुन्दरता है?
अगर कोई चीज़ मन को सुन्दर लगती है तो वह उसे अपनाने कि होड़ मैं लग जाता है, तब सुन्दरता वासना मैं परिवर्तित हो जाती है और उसे वश मैं कर लेती  है. हम वासुदेव को भूल जातें हैं. फिर कुछ समय पर्यंत वही चीज़ उसे मलिन लगने लगती है और वह उससे दूर भागता है. 


दो प्रेमी जब मिलते हैं तो एक दुसरे से वादा करते हैं कि मैं तुम्हारे बिन जी नहीं सकता. एक बार उसे पा लेते हैं और अनुभव कर लेते हैं  फिर कहतें हैं कि तुम्हारे साथ जी नहीं सकता.
हम बाज़ार मैं जातें हैं और घर के लिए सुन्दर सुन्दर वस्तु लाते हैं. एक बार खरीदने के बाद जब वह हमारी हो जाती है तब घर के किसी कोने मैं पड़ी वह धूल खाती रहती है. 

ऐसी कौन सी चीज़ है जिसके लिए तुम तत्पर रह सकते हो और जिसके पाने से तुम्हे मलिनता नहीं लगे और न ही वह कभी असुंदर हो सकती हो? जिसके चस्के मैं मस्ती हो, एक उमंग हो. हमेशा हो.


कहा जाता है कि ध्यान मैं जब हम चैतन्य कि अनुभूति करते हैं तो वह अनुभूति सहर्स्त्र रक्तियाओं के सामान होती है, हजारों संभोगो का एक क्षण. कभी लाश के साथ कोई सम्भोग नहीं करता, दो शरीर के खिसने मैं वह रक्ति नहीं मिलती. तब भी कहीं चेतना होती है लेकिन वह जनेंद्रियों के आकर्षण के पीछे छुपी होती है. जैसे कि आंखों मैं धूल आ जाये तो हर दृश्य मलिन दीखता है. 
जो लोग night club वगेरह मैं दिन रात सम्भोग करते हैं उनकी हालत सड़क पे पड़े मरियल कुत्ते से भी दीन होती है. कभी देखा है उन्हें.

पता नहीं हमने कितने जन्मों से कितना सम्भोग किया है फिर भी जनेंद्रियाओं का आकर्षण जाता नहीं है. लेकिन यह बात निंदा करने कि नहीं है, यह सामान्य ही है और हर प्राणी मैं देखी जाती  है. जनेंद्रियाओं के प्रति हमारी जानकारी बाल्य अवस्था मैं होती है, फिर जब उन अंगों का विकास होता है तो हमारी उत्सुकता ओर बाद जाती है ओर हम उस कोतुल्ह्ता मैं पता नहीं क्या कर गुजरते हैं, जब हम  युवा अवस्था मैं गुजरते हैं तब पता चलता है कि क्या व्यर्थ समय था ओर बुडापे तक हम उससे विरक्त हो जाते हैं. कुछ लोगों मैं यह बुडापे तक भी रहती है लेकिन वह बेचारे दया के पात्र होते हैं.
लेकिन जब हम इसके आकर्षण से परे हो जाते तब ब्रह्मचर्ये घटित होता है. यह बाल्य , युवा या वृद्ध अवस्था मैं कभी भी हो सकता है. यहाँ से आत्म ज्ञान का सफ़र प्रारंभ होता है.
 ब्रह्मचर्ये एक घटना है.
तब हम पाते हैं कि हमारी आत्मा अति सुन्दर है. सिर्फ सुन्दर ही नहीं, अति सुन्दर आत्मा है. और यह सुन्दरता कभी फीकी नहीं पड़ती. सत्यम शिवम् सुन्दरम. न कभी इसमें मलिनता आती है. यह परस्पर अनुभव ही साधक का मार्ग दर्शक होता है, कि कहीं इस जन्म मैं यह अनुभव हो जाये.
   
इसलिए हमारे शास्त्रों मैं हर अंगों मैं एक देवता का वास बताया है और उसका पूजन होता है. जैसे कि रूद्र पूजा मैं कहता हैं कि जनेंद्रियाओं मैं ब्रह्म प्रजनन हो, पाद मैं विष्णु भगवान् का, पेट मैं अग्नि देव का आदि आदि. किसी भी अंग को नहीं छोड़ा है. कुछ मंदिरों के बाहर तो नग्न देवतायों  कि प्रतिमायें होती हैं, और जब हम मंदिर का चक्कर लगाते हैं तो उनको नमन करते हैं. हम अपनी काम वासना को बाहर हो छोड़ देते हैं. फिर हम अन्दर मंदिर मैं जा कर भगवान् का ध्यान करते हैं.
हमने गोमेत्स्वर कि भी बड़ी बड़ी प्रतिमायें बनायीं है, उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं. इस मामले मैं जुन्गालोँ मैं आदि वासी भी वस्त्र हीन होतें है ओर जनेंद्रियोँ कि छुपा छुपी से बच जाते हैं.  
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आत्म हत्या करते वक़्त हम सोचते हैं कि इससे हमें दुःख से छुटकारा मिल जाएगा, लेकिन हमें क्या पता कि उसके बाद हमारी आत्म अगले शरीर पाने के लिए ओर भी व्याकुल होती है ओर तड़पती रहती है. फिर हमें पश्चाताप भी भोगना पड़ता है. जैसे आपको ठंडी लग रही हो तो क्या आप अपने शरीर से शाल ओर स्वेअटर निकाल के फ़ेंक दोगे, वह तो बेवकूफी होगी. 
जो लोग समाधी मैं जाते हैं वह लोग स्वेचा से एक सुख कि स्थिथि मैं होते हुए ओर एक सुख कि ओर जाते हैं, उनकी आत्म १०,२०,२०० साल तक रहती है लेकिन शरीर तो इतने वर्ष नहीं रह सकता है, इसके लिए उनकी समाधी लगायी जाती है जैसे कि संत ज्ञानेश्वर कि. 
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धर्म ओर अध्यात्म मैं अंतर. धर्म कई है जैसे , शैव, वैष्णव, बुद्ध,जैन, मुस्लिम,ईसाई, लेकिन उन सब को जोड़ने कि वस्तु सिर्फ यह सौंदर्य पूर्ण आत्म होती है जिसकी जानकारी हमें अद्यात्म से होती है.  

Saturday, June 12, 2010

तुम दीन नहीं हो - live ashtavakra commentary by Sri Sri Ravishankar ji

तुम वही हो. तुम सूर्य कि किरण नहीं, तुम उस किरण का विस्तार हो. तुम सूर्य हो. 
जिस प्रकार सूर्ये अपनी किरणों को हर खिड़की के माध्यम से हर घर मैं भेजता है, उसी प्रकार परमात्मा अपनी पूर्णता को छोटी छोटी आत्मायों मैं भेजता है. 

यह बात दूसरी है कि जब आत्मा अपने पुर मैं वास करने लगती है, अपने शरीर रुपी घर मैं रहने 
लगती है तो भूल जाती है कि वह सिमित नहीं है, उसका विस्तार ही परमात्मा है. 

लेकिन घर मैं घुसने के बाद आप कांच के टुकड़े मैं सूर्य का प्रतिबिम्ब देखते हो ओर अपने आप को सिर्फ एक किरण मात्र समझने लगते हो. जरा बाहर झाँक कर भी देखो, सूर्य का अनुभव तो करो. तुम्हारे आस पास भी वही सूर्य का अंश है. तुम्हारे पड़ोस मैं भी वही सूर्य कि किरण है, तुम्हारे गाँव मैं जो रिश्तेदार हैं वहां भी वही सूर्ये है. सूर्य कोई भेद भाव नहीं करता. तुम क्यूं ऊँच- नींच मैं पड़े हो. 


तुम्हारे दुःख का कारण  क्या है. तुम गुरु से तो मिले हो. तुमने गुरु को साक्षात् किया है. लेकिन तुम संपूर्णतः यह निश्चय नहीं कर पाए हो कि येही सत्य है. पूरे भरोसे कि कमी होने से ही दुःख होता है. 
  
यह संकल्प किस के पूरे होते हैं? आपके जो एक दिन मैं ५०००० संकल्प करते हैं या उनके जो ५० दिन मैं एक करते हैं. ऋषि मुनियों का मन शांत होता है ओर जब उस शांत मन मैं संकल्प उठता  है तो वह अवस्य पूरा होता है. 

यह संकल्प उस बिजली कि शक्ति के सामान है जो एक सेल मैं भी होती है ओर मैन लाइन  मैन भी होती है. सेल मैन चंद वोल्ट कि होती है ओर मैन लाइन मैन ४४० वोल्ट कि होती है. आपके संकल्प जब हजारों मैन होतें हैं तब आपकी उर्जा बिखर जाती है ओर आपके संकल्प कि सकती एक सेल के बराबर हो जाती है. लेकिन जब ध्यान से जब आप अयोग्य से योग्य के मार्ग पे आ जाते हो तो आपकी संकल्प शक्ति के वोल्ट बड़ते जाते हैं. यह शक्ति किसी आतंकवादी कि बन्दूक से कम नहीं, न ही हमें इसे छोटा समझना चाहिए. तुम्हारे भावों के प्रहार से कई लोग एक साथ प्रभु मार्ग के लिए तत्पर हो सकते हैं. कभी अपनी प्रीति को आजमा के देखा है क्या?

दूसरा नियम संकल्प पूर्ण करने में है कि संकल्प लेने के बाद आप उसे  अपने किसी प्रिये जन को समर्पित कर दें या फिर गुरु को. उसे अपने से चिपका कर नहीं रखें. उससे मुक्त हो जायें. तब प्रकृति कि सारी शक्तियां उसे पोर्न करने में लग जातीं हैं ओर वह पूर्ण हो जाता है.
जैसे कि आप सिनेमा देखने जाते हो तो टिकेट खरीदकर दरवाज़े पर उसे किसी को दे देते हो.  उसे अपने पास रखोगे तो न तो अन्दर जा पाओगे, न सिनेमा देख पाओगे, ओर चिंता में रहोगे कि कोई मेरा टिकेट छीन न लें. उसे समर्पित करो ओर सिनेमा में मस्त रहो. 


तीसरा नियम होता है कि आप सकल्प करने के बाद उस पर सवाल नहीं करैं, शक नहीं करने ओर न ही उसे संशय से भर दे. आप कार से कहीं जा रहे हो तो हैण्ड brake लगा के कार चलोगे तो आगे जाने में कितना सफल होगे. जिसको संकल्प दिया है उस पर विस्वास करना सीखो.

कुछ लोग सुदर्शन क्रिया को exercise मान कर करते हैं और उसके भव में नहीं डूब पाते हैं, इसलिए उनपर उसका असर नहीं पड़ता है. वह अधर्म पर चलते रहतें और उनकी समझ में में नहीं आता है कि इस क्रिया का आसर उनपर क्यूं नहीं हो रहा है.  या फिर ऐसा भी हो सकता है कि जो आपको अधर्म दिख रहा हो वह उनके लिए धर्म हो, जैसे कि श्री राम या फिर श्री कृष्ण का मार्ग. लेकिन जहाँ तक हो सके हमें श्री राम के मार्ग पर ही चलना चाईए और उसे धर्म मानना चाहिए.

आज कल के युवा परेशान रहतें हैं कि उनके माँ बाप उनकी बात नहीं मानते हैं और अपनी बातें उन पर धोपते रहतें हैं. तो इस कारण हमें उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोडनी चाईए और समझना चाहिए के उनके समय के हिसाब से वह सही हैं लेकिन इसका मतलाब यह नहीं कि हम उनकी सर्री बातें माने, हमारे समय में भी बदलाव आता है और हम उसके साथ बहते हैं, उसके साथ समझोता करते हैं. हमें अपनी मर्यादा निर्धारित कर उसमें रहना जरूरी है.

Tuesday, June 08, 2010

सोहम का महत्व - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji

मैं वही हूँ. न मैं त्रितिये व्यक्ति मैं हूँ, न द्वितीये व्यक्ति मैं हूँ. मैं खुद खुदा हूँ. सो हम.

यह नाम तुम्हे दिया गया है. यह तुम नहीं हो.

एक बार एक संत जंगल के बीच मैं अपनी झोपड़ी मैं थे. तब वहां कोई ढेर सारा खाना लेके आ गया. उन्हें हैरानी हुई कि ऐसा क्यूं हुआ. तभी वहां ३-४ लोग आये ओर उनसे कहा कि हम भूखे हैं, हमें भोजन चाह्यिये. संत  ने कहा कि मिल जाएगा. वह लोग हैरान हुए ओर कहा कि यहाँ तो कुछ नज़र नहीं आता है. तब संत ने कहा कि
"सच है कि मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन मैं जिसके पास हूँ उनके पास सब कुछ है. "
 
माँ बच्चे  को जन्म देने से पहले ही उसमें दूध आ जाता है. प्रकृति का नियम है कि जहाँ प्यास होनी होती है वहां पहले से पानी व्याप्त होता है. यह दूसरी बात है कि आपको  दीखता नहीं है.  

आप पूर्ण हो क्यूंकि आप पूर्ण से बने हो ओर पूर्ण मैं रहते हो ओर पूर्ण मैं जाना है. पूर्ण मैं से पूर्ण को निकालने से क्या पूर्ण अधूरा हो जाता है.

आप अकेले से बोर क्यूं होते हैं, क्यूंकि आप ने अपने आप को नीरस कर दिया है. आपके पास जिस परमात्मा को होना था वह आपको कहीं ओर दीखता है. आपके पास ढेर सारे प्रश्न होतें हैं, आपके सरे आश्चर्ये भय मैं ढक गए हैं.

जब आप हमेसा आश्चर्ये मैं होतें हैं तब आप अपने से करीब होतें हैं.
जब आप शंका करते हैं तो आप खुद से दूर होते जाते हैं.

अपने जीवन मैं रस भरने के लिए योग का सहारा लेना ही होगा.
 
संख्या का महत्व हमने  नहीं जाना, अब विज्ञानं मैं विकास होने के बाद लगता है संख्या का संतुलन विश्व के अस्तित्व के लिए आवश्यक है. यह स्ट्रिंग थेओरी का तथ्य है.

रूद्र पूजा मैं भी १,३,५,७ आदि गिनती होती है. कुछ लोग सोचते हैं कि अब पूजा पूरी हुई. उसके आलावा हम संसार कि हर वास्तु को नमस्ते करते हैं, यहाँ तक कि उन चीजों को भी करते हैं जो हमें तकलीफ देती हैं.

जब हम एक होतें हैं तब हम सुखी होतें हैं. जैसे प्रीति मैं. अगर हम अपने प्रियेतम को अलग रखेंगे तो हमें कस्ट होगा, तब हम उसमें दोष ढूढेंगे ओर देखेंगे, लेकिन जब उन्हें खुद ही समझेंगे तो दोषमुक्त होंगे.

उसी प्रकार हम अपने शरीर, मन ओर साँस को तीन सोचेंगे तो कस्ट मैं होंगे. मन कहीं ओर, सांसों कि लय कुछ ओर ओर शरीर की लय कुछ ओर. लेकिन जब तीनों को एक देखेंगे तब मन शरीर के साथ रहेगा ओर जहाँ भी शरीर मैं कस्ट होगा वहां सांसों को ले जाएगा ओर ठीक कर देगा. दिन के हर पल मैं तीनों मैं बदलाव आता है लेकिन अगर तीनों लय मैं ओर एक दुसरे के पास हों तो प्रीत होती है. 

प्रकृति का नियम है की इच्क्षा प्रकट होने से पहले उसकी पूर्ती की तैयारी हो. जैसे की आपको पेट मैं दर्द है तो उसकी इच्क्षा आपने प्रकट की होगी तभी दर्द है. लेकिन आपको लगने लगा है की दर्द पहले हुआ अब मुझे इसका निवारण करना है, ओर उसके लिए आपका दृष्टीकोण बाह्ये होता है, आप दवाई के लिए बाहर भागते हैं.

मंत्रों का अर्थ समझ मैं आये या नहीं लिकिन मंत्रो के स्नान से, ओर उन तरंगों मैं विलीन होने से भी उतनी शांति मिलती है. आँख बंद कर लो ओर उनमें डुबकी लगा लो, तार हो जोअगे.

कुछ लोग चमत्कारों के पीछे भागते है, वहां जाने से पहले सतर्क रहना. हर पल एक चमत्कार है. प्रभु से उस बुद्धि की प्राथना करो जो तुम्हे इस चमत्कार से अवगत कराती रहे. यह नहीं की तुम्हारी सांसें चमत्कार हो ओर तुम हिमालय मैं खोज रहे हो की प्रभु कुछ तो दिखायो की मैं मंत्र मुग्ध हो जाऊं.

Tuesday, June 01, 2010

अति सूक्ष्म परमात्मा - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 11

 जनक अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अनुभव करते हैं कि वह मुक्त हैं, इसी वक़्त अपने आप को स्वतन्त्र पाते हैं. ओर लगभग अपने आसन से उछाल लगा जाते हैं ख़ुशी के मारे "अहो निरंजन !!". वह अपने आखरी दम तक राजा रहे, अपना राज्य चलाया, न किसी आश्रम मैं भागे ओर न ही किसी जंगल मैं निकल गए. जनता जनार्धन कि सेवा करते रहे ओर मुक्त भी रहे.

उसी प्रकार जब तुम भी इस स्थूल रूप मैं खोये होते हो तो अपने सूक्ष्म को नहीं देख पाते हो जो तुम हो. जब तुम सूक्ष्म तक नहीं जा पाते हो तब अति सूक्ष्म तो बहुत दूर कि बात है, इसलिए परमात्मा से तुम्हारा संपर्क नहीं हो पता है. 

अगर तुम्हारी नज़र पेड़  पर अटकी हो तो उसके पीछे का आसमा तुमसे ओझल हो जाएगा, न बदल नज़र मैं होंगे ओर न ही उड़ते फिरते निर्भीक पंछी दिखेंगे.

तुम्हारा ध्यान तब ही सफल हो पाएगा जब तुम इन बातों का ध्यान रखोगे. ध्यान मैं कुछ पाने का प्रयास न करो, कुछ होने कि कोशिश न करो, अकिंचन रहो ओर सिर्फ देखो कि क्या हो रहा. इस कि चिंता नहीं करो कि क्यूं हो रहा है, बस देखो ओर देखते देखते ही तुम सूक्ष्म कि ओर बड़ते जाओगे ओर एक दिन अपने से मुलाक़ात हो जाएगी. जब खुद से मिलोगे तो खुदा अपने आप आ जाएँगे.

अगर तुम सेल फ़ोन पे ध्यान दोगे ओर उसे ही सब जानोगे तब तुम उस tower तक नहीं पहुँच पाओगे जो इन तरंगों को पकड़ता है ओर सब तक पहुंचता है.

तुम एक समुद्र मैं उठी लहर हो, लेकिन तुम्हारा अस्तित्व का आधार सारा समुद्र है. तुम सतह पर अलग अलग लेहेरें हो. अलग अलग दीखते हो लेकिन एक ही समुद्र से उत्पन होते हो ओर उसमें समां जाते हो. तुम उसके ही हो. तुम वही हो. येही तुम्हारी आत्म ज्ञान का अंत है.

तुम्हारे जन्मदिन को जयंती क्यूं कहतें हैं, क्यूंकि इस दिन जय का अंत होता है. जब दो होते हैं तब जय ओर पराजय होती है. तुम किसके साथ लड़ रहे हो. यह शरीर पाने के लिए तुम्हे संघर्ष करना पड़ा. अब इस शरीर पाके भी झूस रहे हो. किसके साथ लड़ रहे हो, क्यूं लड़ रहे हो. तुम अलग नहीं हो. तुम दोनों एक ही तरफ हो. हर जन्म दिन पर तुम्हे इस बात को फिरसे याद करना होगा, ओर समझना होगा कि यह युद्ध नहीं है, यह योग है जो तुम्हे योगता देगा. उस योगता से तुम्हे आत्म शांति मिलेगी. तुम्हारी उर्जा तुम्हारे ओर तुम्हारे आस पास के जन समुदाय के लिए खर्च होगी.

तुम्हारे आस पास संघर्ष होता है क्यूंकि तुम्हे जय कि तलास होती है, तुम्हारे आस पास शांति होगी अगर तुम खुद शांत होगे. खुद को शांत करने के लिए  तुम्हे इस शरीर को इस संसार का अंग मान कर उसकी क्रियाओं मैं उसकी मदद करनी होगी ओर अपने आप को साक्षी बनाये रखना होगा. यह निर्णय अभी ओर इस वक़्त ही होगा. यह भाविस्ये मैं होनी वाली घटना नहीं है.

आप जहाँ भी हैं , जो भी कार्य करते हों, उसमें अग्रसर रहो, कुछ त्यागने कि आवश्कता नहीं है, कर्तव्य विमूड होने कि जरूरत नहीं. जनक कि तरेह आप भी अपनी सरकार चला सकते हो ओर मुक्त रह सकते हो.
 

A public lie

The home minister of India Mr. P. Chidambaram seems to have landed into the wrong job at the right time. There is upsurge of Maoists, there are series of trials on terrorists and the country is witnessing attacks on saints. Instead of acknowledging the lapses in internal security and how we manage terror he is lost in words.

Like for example you take the recent case of attack on Sri Sri Ravishankar. The karnataka police calls it a incident. Mr. Home Minister calls it "an internal brawl". They claim that Sri Sri had left the place of incident 5 mins before it happened.

Its like saying saying "The prime minister convey was leaving and somebody fired at the last car in convey. Fortunately the prime minister was in first car but the shooter did not know. So a bodyguard got hurt. Our internal investigation has revealed that there was an conflict between the shooter and the bodyguard. They were not keeping in good terms and as a result of last night brawl between the two the shootout occurred. It was unfortunate that the shot seems to be fired at prime minister but he was not the actual target of bullet."

Can it get funnier than that? How can you trust your government and police when they make out such statement? Doesnt it look silly to them that they would be laughed at because of their childish reaction?

If it was an incident then why were a platoon of police putting loud radio in ashram campus, loitering away here and there, not knowing what to do and standing in group chit chatting. Just to follow up on silly incident.

If saints have this kind of support from the government and police , what can ordinary citizens like you and me can expect?

A blatant lie has to be blasted and exposed. 

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