Thursday, June 17, 2010

ईस्वर अनुभव क्या है- live ashtavakra geeta by Sri Sri Ravishankar ji

गुरु  ओर शिष्य में क्या अंतर है?
गुरु पूर्ण है ओर शिष्य खाली है. 

ईस्वर का अनुभव कैसे हो?
ईस्वर किसी सवाल का उत्तर नहीं है. आप यह नहीं कह सकते कि यह है या वह है. वह आपके प्रश्नओं का समाधान है. वह विराम है. उसका अनुभव ठहराव में होता है. आप भागते रहोगे तो उससे दूर ही रहोगे. आप थम जाओगे तो वह अनुभव हो जाएगा. 

उसका स्वाभाव है प्रेम ओर शांति. उस स्वाभाव तक पहुंचे के आपको ध्यान में शांत होना होगा. प्रेम में विलीन होना होगा. संपूर्ण समर्पण कि स्तिथि में  आप उसके स्वाभाव के करीब होगे. उस मौन में उसका अनुभव समाया है. 

यह शांति आपको किताबी ज्ञान या श्रवण मात्र से नहीं मिलती है. इसके लिए आपको गुरु के सनिध्ये में होना होगा, उनकी शांति में अपने स्वरुप का अनुभव करना होगा. इससे आसन तरीका कोई नहीं. ऐसे समर्थ गुरु बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, अति दुर्लभ होते हैं, ओर कई जन्मों के प्रयास के बाद उनका संग मिलता है. 


आपने किताब में पड़ा  के तैरना कैसे सीखे. आपने कुछ चित्र देखे. आप सीख कर किसी को सुना भी दिया. लेकिन अभी तक आपने पानी में डूप्की लगाने कि हिम्मत नहीं जुटाई. न आपको उस किताब कि तकनीक पर यकीन हुआ ओर न ही उन चित्रों पर ओर न ही उन सारे मित्रों पर जो आपको  तैर के भी दिखा दिए. आपने किसी को समर्पण नहीं किया ओर साडी दुनिया को बताते रहे कि ऐसे तैरते हैं. ऐसा गुरु बनकर कितने लोग आप पर एकिन करेंगे. कितने दिन आपकी बात छुपी रहेगी.
एक बार एक नाव से एक आदमी गिर गया. उसे बचाने के लिए ओर एक आदमी कूदा ओर उसे बचा लिया. सबने बचाने वाले कि बहुत वह वह की. लेकिन वह आदमी क्रोधित दिखाई दिया. सब हैरान थे की इतना नेक काम करने के बाद भी वह क्रोधित क्यों है. उसने कहा के पहले मुझे यह बतायो की मुझे पानी में ठकेला किसने?


आप जड़ ओर चेतन के बीच में मनुस्ये रूप में डावांडोल हो रहे हो. कभी आप जानवर जैसा व्योहार करते हो ओर कभी देवत्व जैसा. एक जगह टिक नहीं पा रहे हो. उस चिन मात्र की सत्ता को पकड़ नहीं पा रहे हो. एकाग्रित नहीं हो पा रहे हो. विचलित ही रहते हो. 
पत्थर के ऊपर जूता मारो या फूल चडाओ उसे क्या फर्क पड़ता है. आप जब तक जड़ हो तब आप कहो की किसी के कहने बोलने से मेरे ऊपर कोई नहीं फर्क पड़ता तब आप मुर्ख ही रहोगे. लेकिनजब आप देवत्व को प्राप्त हो जाते हो ओर कहते हो की यह सब अपने हैं ओर इनकी बातों का मुझ पर असर नहीं पड़ता तब आप चेतना के समीप होते हो.
  
आप जब बनते हो तो तीन गुण आपको अधीन करते हैं. एक लोभ, एक भय, ओर एक प्रेम. यह तीनों में से कोई एक आपकी करनी का कारण होता है. आप जिसकी मात्रा बढाएंगे उसी हिसाब से आपको फल भी मिलेगा. 

आप अपने भीतर झाँक कर देखो की आपके अन्दर किसकी सत्ता है. क्या आप अभी भी भिग्मंगों की तरह साडी दुनिए से अपने लिए कुछ मांगते हुए नज़र आते हो, की मुझे क्या मिलेगा, इससे मेरा कैसे फायदा होगा. या फिर आप यह सोचते हो की मेरे पास जो किस है उससे दुनिया में किसका ओर कैसे फायदा होगा. 
मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ओर न की तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो.


आश्रम का नियम है की यहाँ पे आओ तो यहाँ अपने दुःख छोड़ के जाओ. एक बार एक महिला मैं कहा की मैं अपनी सासू माँ को यहाँ छोड़ के जाना चाहती है. क्यूंकि वह मुझसे रोज झगडती हैं. इसका निवारण दो तरीके से हो सकता है. एक तो आप उन्हें आपनी माँ का दर्जा दें ओर जैसे अपनी माँ के अंचल मैं झगडे के बाद पहुँच जातीं हो वैसे ही उनके अंचल की लालसा रखो. या फिर हर दिन एक नया कारण ढूँढो झगडे का. पुराणी बातों को नहीं दोराहो. उसका मजा है , क्यूंकि पुराणी बातें आसानी से आती हैं ओर नए कारण मुह्किल से मिलते हैं.
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