Sunday, May 23, 2010

मध्य मार्ग - live ashtavakra by Sri Sri RaviShankarji - Day 3

अति मैं इंसान परेशान हो जाता है. इतना काम मैं विलीन हो जाये ओर  फिर थक जाये या फिर इतने आलस मैं रहे की सिर्फ अपना वजन बडाये. इसलिए मध्य मार्ग मैं चलो.

जब हम पैदा हुए थे तब चार किलो के थे ओर अब ६०, ७०, ८०, ९०, ओर कोई तो १०० किलो का भी हो गया है. यह वजन अन्न से आता है. पञ्च तत्वों मैं पृथ्वी हमें वजन देती हैं. अन्न से मन भी बढता है.

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के यहाँ पांच साल तक सूखा पड़ा तो वह बहुत परेशान रहा. फिर  बारिश हुई, फसल आई तब भी वह दुखी था. किसी ने पुछा क्या हुआ मुल्ला, इतने दुखी क्यूं हो. उसने कहा "अब फसल काटनी पड़ेगी, मेहनत करनी पड़ेगी".

सत्य  लेकिन इन पञ्च तत्वों से परे है. इस मृत्यु लोक मैं सब काल से परे नहीं है. पेड़ भी आते हैं ओर जाते हैं. शरीर भी आता है ओर जाता है. यह पञ्च तत्त्व मिल के कई प्रकार के प्राणी बनाते हैं, वह भी आते हैं ओर जाते है.

एक तुम्हारा चित, तुम्हारा चैतन्य,  काल से परे है, वह हमेशा से था, है  ओर रहेगा. अगर तुम चित बोध को शरीर का साक्षी मान लो तब तुम्हारी पीड़ा कम हो सकती है, बंधन मिट सकतें हैं ओर मुक्ति की इच्क्षा प्रबल हो सकती है.

साक्षी  बनकर तुम सहजता से समन्वय मैं रह सकते हो. तुम दया ओर क्षमा के करीब हो सकते हो. दया मैं तुम क्रोध से दूर रहते हो. क्षमा तुम्हें सबके करीब रखती है, खुद के भी. कभी खुद को भी माफ़ कर के देखो.

पृथ्वी कितनी दयालु है, तुम उसे खोदते हो ओर वह पानी देती है. कहती है लो बेटा पानी पियो, फिर खोद लेना. क्या वह तुम पर क्रोध करती है की क्यूं मुझे कस्ट दे रहे हो? 
किसी से कोई गलती हो जाये तो उस पर चिल्लाने से क्या वह गलती सुधर जाएगी या मिट जाएगी? क्या तुम हंस कर कह सकते हो कि "कोई बात नहीं, चलो इसे मिल कर ठीक करतें है."

संतोष तुम्हारे पास है. उसे इधर उधर क्यूं ढूँढ़ते हो. इस सत्य को समझो ओर अनुभव करो.
एक साथ जब सब एक सब्द का उच्चारण होता है तो उसे भजन कहतें हैं. सत्संग मैं हम सब एक साथ हरि नाम भज ते हैं की नहीं.  
पूजा करते समय अगर भाव न हो ओर ध्यान कहीं ओर हो तो ऐसी पूजा से नुक्सान ही होगा.


What is happiness? Happiness is when you tend to flow along with life. Its not a moment in past neither its in memory. When you fallback to memory that is a sign that you are sad and you have stopped living. So the question "What was the moment in your life when you were most happy?" does not have any relevance. You are seeking to shake the dead. Happiness begins with sharing, when you just cannot suppress the desire to give.

Sometimes you may be tired and frustrated with doing seva. Body and mind can get tires. Give them rest, विश्राम दो उन्हें, साधना करो, प्राणायाम करो. Recharge and then come back but remember no excesses in life, live in balance like you ride the bicycle, the more you bent towards worldly or spiritual life the more distress you will have. But you are able to strike and balance then the ride becomes natural and effortless.

क्षमा, दया , संतोस, ही वह सत्य हैं जिनका तुम हमेशा भज करो.
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