Thursday, June 15, 2017

एक तरंग

उसकी एक तरंग से सारी सृष्टि चलती है
और तुम भी  उसकी स्पंदन हो 
फिर क्यूँ पड़ते हो 
शब्दों की जंजाल मैं 

उसने ऐसा कहा 
क्यूँ कहा, कैसे कहा 

मुझे ऐसा लगता है 
ऐसा होना चाहिए था 
उसे ऐसा करना चाहिए 

शब्दों के तार 
जब धुन पकड़ते हैं 
तो तर्क चलते रहते हैं 

एक शब्द दो होते हैं 
दो से चार होते हैं 
डोर से रस्सा बन जातें हैं 
तुम्हें घिस जाते हैं 
तुम छीलनी होते जाते हो 
फिर भी रुक नहीं पाते 

हल्के से शब्द 
पत्थर बन जाते हैं 
बाक़ी जीवन तुम उन्हें ठोते रहते हो 
पीड़ित हो पुकारते रहते हो 
पता नहीं कहाँ शूरुआत हुई 
नासमझी मैं मार जाते हो 

अगर पकड़ना ही है 
तो गुरु वाक्य पकड़ो 

गुरु शब्दों मैं गहरायी हैं 
गुरु शब्दों मैं थहराओ है 

गुरु संग मैं 
रुक कर भी अनंत पहुँचते हो 
थम कर भी विस्तारित होते हो 
विशाल और शून्य जैसे होते हो 
एक पल मैं 

उस तरंग मैं विलीन होते हो

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This poem was born post samyama.

Samyama is an art of living program spread over 7 days in which you intensify your sadhana and go deeper into your yoga practice. The first one concluded yesterday and was taken by HH Sri Sri Ravi Shankar ji.
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