Friday, January 29, 2010

मन मैं विचारों का मंथन

एक समुद्र मंथन था और एक विचारों का मंथन है.
उसका घटनास्थल विशाल समुद्र था, इसका घटनास्थल विशाल मन है.
उसमें देवता, दानव और परमात्मा थे , इसमें अच्छे, बुरे विचारों के ऊपर विवेक और बुद्धि हैं.
उधर चाह अमृत की थी, इधर मुक्ति की है.
उधर देवता दानवों के बडती शक्ति से परेशान थे, इधर अच्छाई बुराई की कहर से परेशान है.
जब विष निकला तो शिव आये, इधर भी कभी सत्य से संपर्क होगा.
उधर भी देवता सुख, शांति और ख़ुशी चाहते थे, इधर भी वही इच्छायें हैं.
उधर भी देवताओं को अपना आसन और स्वर्गलोक छोड़ कर घनघोर समुन्द्र मैं खड़े होके परिश्रम करना पड़ा,
इधर भी हमें चिंतन , मनन, करना पड़ेगा, नहीं तो विवेक बेचारा कोने मैं सड़ता रहेगा, बुद्धि भ्रस्ट  तो हो ही गयी है , ओर विकारों से युक्त हो जाएगी, तुम भोगते रहोगे और योग की बातें सुनते रहोगे ओर मेरी तरेह सुनाते रहोगे .

अपने जीवन मैं सबको मंथन करना पड़ता है, हर इंसान को, हर बार, हर जन्म मैं.

यह तप आज से ही चालू हो जाए तो अच्छा  है, वर्ना ज़िन्दगी विष तक ही पहुँच कर चूक जाएगी. kya kehte हो!
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