Wednesday, February 20, 2013

To the welfare of farmer - अन्नदाता सुखी भव

अन्नदाता सुखी भव !!

यह मन्त्र है गुरुदेव का
अन्न के हर दाने को
लेने से पहले
चार बार कहने को

तुम्हारी दुआ किसान
को मिलती है
किसान सुखी और समृद्ध
रहता है
उसकी फसल मैं
प्रेम और रस होता है

व्यपारी किसान को सही
सही दाम देता है
लोभ मैं नहीं होता है
अन्न तुम तक आता है

घर की महिला उस
अन्न को मन से बनाती है
अन्नापुर्नेस्वारी कहलाती है

वही महिला चंडी का रूप
भी ले सकती है
जब व्यापारी लोभ मैं
किसान को कम दाम
और तुम्हे भी नोंचता है
तुम उसे लूटने को कोसते हो
किसान गरीब होता जाता है
आत्म-हत्या की ओर
अग्रसर होता है

समाज मैं बीमारी और
भ्रस्टाचार बड़ता है
एक दुसरे के प्रति
नफरत, दुराचार
बड़ता है

अन्नदाता सुखी भव !!
से किसान ,व्यापारी और
तुम्हारी घर गृहस्थी
सुख और सम्पन रहती है
समाज मैं प्रेम और
भाईचारा बड़ता है

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inspired from evening of satsang in presence of HH +Sri Sri Ravi Shankar ji at +Art of Living international ashram on kanakapura road in bangalore

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