Tuesday, April 06, 2010

Manas ganga

गंगा नदी स्वर्ग से आई ओर हरिद्वार , प्रयाग,  से होती हुई गंगा सागर मैं विलीन हो जाती है.
राम चरित मानस की गंगा शिव जी के मुख से निकलती है, हरी कृपा के हरिद्वार से होते हुए, संतों के संग प्रयाग से गुजरती हुई, परम विश्राम पाती हैं गंगा सागर मैं.
वह भागीरथी के तप से प्रकट हुई.
यह माँ भवानी पारवती के अनुग्रह से.
उसमें शिव ने अपनी जटाओं मैं उसे समाया ओर फिर एक लत खोलकर उसे पृथ्वी लोक को पवित्र करने के लिए छोड़ दिया.
इसे शिव ने अपने मुख से सरे ब्रह्माण्ड को पवित्र करने के लिए मुक्त कर दिया.
हरी कृपा पाने के लिए तीन टिकेट चईये. मन, कर्म, ओर वचन बिना चतुराई के. सिर्फ समझदारी से. आजकल बचोँ को हम चतुराई सिखतें हैं, समझदारी नहीं. छल जाने मैं गर्व हो छलने मैं गर्व न हो. बिना कपट के जब हुम हरि से कुछ मांगें तो सिर्क इतना की किसी संत का संग मिले, जिससे वह भी उतना प्रेम करतें हैं जितना तुम हरि से करना चाहते हो. बाकि तो उसने जितना दिया है वह उसकी असीम कृपा है.
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